📝अंदाज़ अपना ..........सुरेन्द्र बंसल का पन्ना
सावधान शिवराज जी
बीते दिनों विश्व धर्म धम्म सम्मेलन मप्र सरकार के प्रायोजन से इंदौर में हुआ। विभिन्न धर्म के संत , पैरोकार, महात्मा , गुरु ने एकत्र भाव से धर्म के प्रति अपनी अन्तर्निष्ठ भावनाएं प्रकट की वहीँ यह भावना भी उभरी कि इस सम्मेलन का औचित्य क्या है ? क्या वाक़ई यह सिंहस्थ की पूर्व तैयारियो के लिए था या कुछेक लोगों का अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास भर था।
सिंहस्थ की तैयारियों के लिए इस तरह के सम्मलेन समय और धन की बर्बादी है। दरअसल सिंहस्थ से इस सम्मेलन का कहीं कोई जोड़ मुझे नज़र नहीं आया ।विश्व शांति ,ज्ञान और अध्यात्म पर चिंतन का समयकाल सिंहस्थ से जुड़ा हो यह कोई तर्क नहीं , विचार नहीं और दुरदृष्टता भी नहीं है। 2016 में होनेवाले सिंहस्थ से हिन्दू धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का कोई सरोकार साकार हो यह भी नहीं है। फिर सिंहस्थ का परिप्रेक्ष्य क्यों?और सन्दर्भ सिंहस्थ तो आयोजन इंदौर में क्यों? आयोजन इंदौर में तो इंदौर के लोगों को दूर रखने का मंतव्य क्यों? ये सारे सवाल इस तर्क को सिरे से नकार देतेहैं कि आयोजन सिंहस्थ पूर्व का चिंतन था ।
आयोजन सिंहस्थ से संदर्भित नहीं था तो क्या था? किसलिए था और इस समयकाल को ही बहाने के तौर पर क्यों इस्तेमाल किया गया? वैचारिक समागम एक सतत प्रक्रिया होना चाहिए लेकिन ऐसे समागम की भव्यता क्यों जरुरी है । श्री भय्यूजी महाराज ने ठीक कहा है जब राज्य का किसान क़र्ज़ में हो और सूखे की मार झेल रहा हो ऐसे राज चिंतन समागम पर बड़ा खर्च करे यह अकल्पनीय है। इस तर्क को अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए आखिर चिंतन और विचार का मूल्य भव्य खर्च से नहीं बढ़ जाता है । आश्चर्य होना चाहिए राज्य का विमान कोई टेम्पो नहीं है उसका आने जाने का खर्च एक बड़ा भार है , इस भार को वहन् करने की क्षमता आप में नहीं है तो किस मुखौटे को पहनकर आप भव्यता का दर्शन देना चाह रहे हैं । यह वैसा ही है आप चमकदार शर्टपेन्ट पहने है और अंदर से आपकी दोनों पाकेट फटी है।
जब कोई संत राज का उपयोग करते हैं तो मुझे लगता है वे महाराज से महाराजा हो जाते हैं तब उनका संत तत्व स्वतः खत्म हो जाता है । समागम में संतो ने राज का भरपूर उपयोग किया है इसलिए ये सब मेरे आदरणीय संतजन तीन दिन तक राज्य आतिथ्य में रहते हुए महाराजा से परिलक्षित होते रहे। चिंतन वस्तुपरक होना चाहिए लेकिन स्वयं वस्तु नहीं बनना चाहिए । मैं यहाँ किसी श्रद्धेय संतजन के विचार को चुनौती नहीं दे रहा हूँ। हर संतजन की संगत , विचार एक दृष्टिकोण देते हुए मार्ग निर्धारित करते हैं । हम एक मार्ग पर चलते हैं संतजन हमें अनेक श्रेष्ठ मार्ग सुझाते हैं सनातन धर्म हमें संत समागम के माध्यम से ये अवसर प्रदान करता है। लेकिन संत जब राज पक्ष का आतिथ्य ले लेते हैं तब उसके तत्व और अर्थ भिन्न हो जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे राज को अपने विचार उद्बोधन से वंचित रखें । जिस राज में संत का विचार महत्व लिए होता है वह राज समाज का उत्तर्दायत्व बखूब निभा सकता है । इसलिए सवाल समागम का नहीं उस दर्शन का है जो भौतिकवाद से निर्मित है। कोई भी संत समागम अतिरेक से पूर्ण न होकर विचार से संपुष्ट होना चाहिए यह कमी त्रिदिवस तक खलती रही और इंदौर जैसा मेरा शहर जो धर्म वृत्त से ओतप्रोत रहता है हतप्रभ सा देखता रहा उसकी कहीं इसमें भागीदारी ही नहीं थी। क्या शहर का धर्म वृत्त इस धर्म समागम चिंतन विचार के अनुकूल नहीं था ।
जब भय्यूजी महाराज जैसे राष्ट्रवादी संत की चिन्ता सामने आती है तो लगता है कहीं कुछ गलत है चिंताएं वह नहीं है जो दिखाई जा रही है । दरअसल सरकारी ओहदे पर बैठे लोग भेद से अपने भाव को प्रकट करने में चतुराई से लगे हैं और निशाने पर वे है जो उनके किसी के काम नाम को आहत नहीं करते लेकिन कहीं उनका अपना वर्चस्व कम होता है । मुझे नहीं लगता कि भय्यू जी महाराज ने रुष्ट होकर अपनी व्यथा को जताया उनकी चिंता वाजिब है लेकिन जो इसे धर्म परिवर्तन से जोड़कर देख रहे हैं वे सतही विचार कर रहे हैं । उन्होंने विकल्पों की बात कर महज चेताया है कि आप स्थानीय लोग और परिस्थितियों की उपेक्षा नहीं कर सकते और अपने स्वहित के लिए किसी की उपेक्षा कर उसे साधन की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते ।
मैं सोचता हूँ प्रदेश के शांत चित्ताकर्षक मुख्यमंत्री इतने असंवेदनशील नहीं हो सकते कि भय्यू जी महाराज जैसी शख्सियत की उपेक्षा करे यह असंभव लगता है लेकिन ऐसा संभव हुआ जब इंदौर के गौरव और प्रतिष्ठित संत व्यक्तित्व भय्यू जी महाराज को ससमय और सादर निमन्त्रण सदभाव समेत नहीं भेजा गया । जाहिर सी बात लगती है शासन के भीतर कर्ताओं में जो लोग हैं वे मुख्यमंत्री को भी नज़रअंदाज़ कर अपना मंतव्य सिद्ध कर रहे हैं ऐसा चल रहा है तो मुखिया के नाते शिवराजसिंह को सावधान हो जाने की जरुरत है ।
सुरेन्द्र बंसल (C)
14:30 30102015
Naisatta News & features Network ( INDORE)
सावधान शिवराज जी
बीते दिनों विश्व धर्म धम्म सम्मेलन मप्र सरकार के प्रायोजन से इंदौर में हुआ। विभिन्न धर्म के संत , पैरोकार, महात्मा , गुरु ने एकत्र भाव से धर्म के प्रति अपनी अन्तर्निष्ठ भावनाएं प्रकट की वहीँ यह भावना भी उभरी कि इस सम्मेलन का औचित्य क्या है ? क्या वाक़ई यह सिंहस्थ की पूर्व तैयारियो के लिए था या कुछेक लोगों का अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास भर था।
सिंहस्थ की तैयारियों के लिए इस तरह के सम्मलेन समय और धन की बर्बादी है। दरअसल सिंहस्थ से इस सम्मेलन का कहीं कोई जोड़ मुझे नज़र नहीं आया ।विश्व शांति ,ज्ञान और अध्यात्म पर चिंतन का समयकाल सिंहस्थ से जुड़ा हो यह कोई तर्क नहीं , विचार नहीं और दुरदृष्टता भी नहीं है। 2016 में होनेवाले सिंहस्थ से हिन्दू धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का कोई सरोकार साकार हो यह भी नहीं है। फिर सिंहस्थ का परिप्रेक्ष्य क्यों?और सन्दर्भ सिंहस्थ तो आयोजन इंदौर में क्यों? आयोजन इंदौर में तो इंदौर के लोगों को दूर रखने का मंतव्य क्यों? ये सारे सवाल इस तर्क को सिरे से नकार देतेहैं कि आयोजन सिंहस्थ पूर्व का चिंतन था ।
आयोजन सिंहस्थ से संदर्भित नहीं था तो क्या था? किसलिए था और इस समयकाल को ही बहाने के तौर पर क्यों इस्तेमाल किया गया? वैचारिक समागम एक सतत प्रक्रिया होना चाहिए लेकिन ऐसे समागम की भव्यता क्यों जरुरी है । श्री भय्यूजी महाराज ने ठीक कहा है जब राज्य का किसान क़र्ज़ में हो और सूखे की मार झेल रहा हो ऐसे राज चिंतन समागम पर बड़ा खर्च करे यह अकल्पनीय है। इस तर्क को अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए आखिर चिंतन और विचार का मूल्य भव्य खर्च से नहीं बढ़ जाता है । आश्चर्य होना चाहिए राज्य का विमान कोई टेम्पो नहीं है उसका आने जाने का खर्च एक बड़ा भार है , इस भार को वहन् करने की क्षमता आप में नहीं है तो किस मुखौटे को पहनकर आप भव्यता का दर्शन देना चाह रहे हैं । यह वैसा ही है आप चमकदार शर्टपेन्ट पहने है और अंदर से आपकी दोनों पाकेट फटी है।
जब कोई संत राज का उपयोग करते हैं तो मुझे लगता है वे महाराज से महाराजा हो जाते हैं तब उनका संत तत्व स्वतः खत्म हो जाता है । समागम में संतो ने राज का भरपूर उपयोग किया है इसलिए ये सब मेरे आदरणीय संतजन तीन दिन तक राज्य आतिथ्य में रहते हुए महाराजा से परिलक्षित होते रहे। चिंतन वस्तुपरक होना चाहिए लेकिन स्वयं वस्तु नहीं बनना चाहिए । मैं यहाँ किसी श्रद्धेय संतजन के विचार को चुनौती नहीं दे रहा हूँ। हर संतजन की संगत , विचार एक दृष्टिकोण देते हुए मार्ग निर्धारित करते हैं । हम एक मार्ग पर चलते हैं संतजन हमें अनेक श्रेष्ठ मार्ग सुझाते हैं सनातन धर्म हमें संत समागम के माध्यम से ये अवसर प्रदान करता है। लेकिन संत जब राज पक्ष का आतिथ्य ले लेते हैं तब उसके तत्व और अर्थ भिन्न हो जाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे राज को अपने विचार उद्बोधन से वंचित रखें । जिस राज में संत का विचार महत्व लिए होता है वह राज समाज का उत्तर्दायत्व बखूब निभा सकता है । इसलिए सवाल समागम का नहीं उस दर्शन का है जो भौतिकवाद से निर्मित है। कोई भी संत समागम अतिरेक से पूर्ण न होकर विचार से संपुष्ट होना चाहिए यह कमी त्रिदिवस तक खलती रही और इंदौर जैसा मेरा शहर जो धर्म वृत्त से ओतप्रोत रहता है हतप्रभ सा देखता रहा उसकी कहीं इसमें भागीदारी ही नहीं थी। क्या शहर का धर्म वृत्त इस धर्म समागम चिंतन विचार के अनुकूल नहीं था ।
जब भय्यूजी महाराज जैसे राष्ट्रवादी संत की चिन्ता सामने आती है तो लगता है कहीं कुछ गलत है चिंताएं वह नहीं है जो दिखाई जा रही है । दरअसल सरकारी ओहदे पर बैठे लोग भेद से अपने भाव को प्रकट करने में चतुराई से लगे हैं और निशाने पर वे है जो उनके किसी के काम नाम को आहत नहीं करते लेकिन कहीं उनका अपना वर्चस्व कम होता है । मुझे नहीं लगता कि भय्यू जी महाराज ने रुष्ट होकर अपनी व्यथा को जताया उनकी चिंता वाजिब है लेकिन जो इसे धर्म परिवर्तन से जोड़कर देख रहे हैं वे सतही विचार कर रहे हैं । उन्होंने विकल्पों की बात कर महज चेताया है कि आप स्थानीय लोग और परिस्थितियों की उपेक्षा नहीं कर सकते और अपने स्वहित के लिए किसी की उपेक्षा कर उसे साधन की तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते ।
मैं सोचता हूँ प्रदेश के शांत चित्ताकर्षक मुख्यमंत्री इतने असंवेदनशील नहीं हो सकते कि भय्यू जी महाराज जैसी शख्सियत की उपेक्षा करे यह असंभव लगता है लेकिन ऐसा संभव हुआ जब इंदौर के गौरव और प्रतिष्ठित संत व्यक्तित्व भय्यू जी महाराज को ससमय और सादर निमन्त्रण सदभाव समेत नहीं भेजा गया । जाहिर सी बात लगती है शासन के भीतर कर्ताओं में जो लोग हैं वे मुख्यमंत्री को भी नज़रअंदाज़ कर अपना मंतव्य सिद्ध कर रहे हैं ऐसा चल रहा है तो मुखिया के नाते शिवराजसिंह को सावधान हो जाने की जरुरत है ।
सुरेन्द्र बंसल (C)
14:30 30102015
Naisatta News & features Network ( INDORE)