Sunday, 2 September 2012

फांसी का बेहतर विकल्प

नरोदा पाटिया के दंगों पर कोर्ट ने जो सजा मुक्कमल की है उससे जाहिर होता है दंगे कितने भयावह थे . जरा विचार करें कि माया कोदनानी और बाबू बजरंगी की सजा तय करते वक़त माननीय न्यायाधीश के मन में किस तरह की भावनाएं आ रही होंगीं , किस तरह वे इंसानियत को तार तार होते देख उद्वेलित हुए होंगें .आखिर माया कोदनानी को २८ साल और बाबू बजरंगी को मरते दम तक जेल में पड़े रहने की सजा सुनाई गयी है . यह सजा फांसी से कम नहीं है हालाँकि कोर्ट ने माना है कि दुनिया के देशों में फांसी की सजा को इंसानियत की खातिर छोड़ा जा रहा है इसलिए वे भी फांसी सुनाने के पक्ष में नहीं है .

दरअसल "फांसी" को किसी सजा का अंतिम छोर माना गया है ,जब कोई क्रूरता इतनी भयावह हो कि कोई सजा उसके मियाद में नहीं आये तो फांसी ही एक मात्र विकल्प होती है . अक्सर फांसी की सजा को दया पर लंबित छोड़ दिया जाता है याने वह क्रूरतम व्यक्ति जिसने कोई दयाभाव और इंसानियत नहीं रखी हो वह इंसानियत की खातिर खुद दया की चाहत रखता है . राष्ट्रपति के पास ऐसी बीसियों याचिका लंबित है जिसमें अफजल गुरु और कसाब जैसे तमाम लोग हैं .जो इनके कृत्य हैं उन पर अदालत ने फांसी याने अधिकतम सजा मुक़र्रर की है. कई मामले ऐसे होते हैं जब दया पर छोड़ना होता है लेकिन अदालत कोई इंसान नहीं है वह को दूर रखकर आँखों पर पट्टी बांधकर न्यायिक दृष्टि से फैसला करना होता है. फांसी सुनाते वक़्त अपराधी के दुष्कर्म ही जज के सामने होते हैं .


फिर भी "फांसी " की सजा को इंसानियत का दुश्मन माना गया है और दुनिया के तमाम देशों में यह चल पड़ा है कि यह सजा ख़त्म होना चाहिए .इस सजा जिसका अर्थ मौत है उसे सुनाने के लिए सिर्फ मज़बूरी ही होती है .इंसानियत की खातिर इस सजा को छोड़ा जा रहा है . कई कट्टर देशों में पत्थर मारने, गोली मारने और सरे राह फांसी दिए जाने का भी प्रावधान है. लेकिन अब सौ से ज्यादा देश ऐसी क्रूर सजा को छोड़ चुके हैं वैसे भी जिसे फांसी होने को होती है उसके लिए यह त्रास उतना ही होता जबतक फांसी नहीं दी जाती जबकि उसे यह संताप और त्रास लम्बे समय तक होना चाहिए .


इसलिए नरोदा पाटिया दंगों पर विशेष अदालत का फैसला फांसी की अमानवीयता पर इंसानियत की नज़र से किया गया सटीक फैसला है . गौर करें अदालत के उस फैसले पर जिसमे बाबू बजरंगी को कोर्ट ने दोषी मानते हुए कहा है कि बजरंगी दंगाईयों का सरगना था .इसने कानून का मखौल बना दिया उसका गुनाह इतना बड़ा है कि उसके केस में आजीवन कारावास की सजा जेल में प्राकृतिक मृत्यु हो जाने तक है .दरअसल माया कोदनानी ५७ साल की है औरबाबू बज़रंगी ४७ साल के इन दोनों की सज़ा बनी रही तो इन्हें ता -उम्र जेल में ही रहना पड़ेगा . अदालत चाहती तो इन दोनों को फांसी की सज़ा सुना सकती थी लेकिन अदालत ने फांसी की सज़ा का बेहतर विकल्प ढुंढ लिया और उसे आजीवन कारावास से बढकर सज़ा सुनाई जो तारीफ -ए-काबिल है .कोई आजीवन सजा से १४ साल में जेल से बाहर आ जाए इससे बेहतर है उसे पूरी सजा मिले ,पूरा जीवन मिले और अपने कर्म पर पश्चाताप यह सोच कर करता और जीता रहे कि काश में यह दुष्कृत्य नहीं करता तो तो नैतिक पारिवारिक जीवन अपनों के साथ जीता . फांसी का इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं हैं .

Saturday, 18 August 2012

नीरो की बांसुरी दिल्ली में नहीं बजेगी न जनता का रोम जलेगा इसलिए जागो .....!!



... लालबहादुर शस्त्री ही क्यों इस समय याद किये जाते हैं जो महज एक रेल दुर्घटना पर पद छोड़ देते हैं यहाँ खरबों के घोटालों की घटना पर भी आप बने रहते है तो संशय तोडिये और अपनी प्रतिष्ठा को स्थापित रखने के लिए ही यह तथ्य बता दीजिये कि घोटाले है ही नहीं . क्योंकि पीएम् साहब कैग के पीएम् ( पोस्टमार्टम ) में आप भी हैं ....और जरुरी यही है कि नीरो की बांसुरी दिल्ली में नहीं बजेगी न जनता का रोम जलेगा इसलिए जागो .....!!

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Monday, 23 July 2012

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Monday, 25 June 2012

यह राजनैतिक उद्दंडता है ...


यह राजनैतिक उद्दंडता है ...



राजनैतिक शिष्टाचार की बातें अब बे- मायने हो गई है .यह शिष्टाचार जब ख़त्म हुआ तो राजनैतिक अराजकता बढ़ने लगी ,नतीजा यह हुआ कि कई क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ और वे राजनीति से नीति दूर कर राज़ करने कराने में कामयाब हो गए .अब जो चल रहा है वह राजनैतिक उद्दंडता का दौर है . इन उद्दंडताओं के लिए राजनैतिक दलों में प्रवक्ताओं का पद स्थापित किया है , जो पद पर नहीं है पर वाकई उद्दंड है वे भी जिम्मेदारी निभा रहे है . लगभग हर राजनैतिक दल में ऐसे लोग काम पर राजनैतिक उद्दंडता के लिए लगाये गए हैं .नाम विशेष की चर्चा इसलिए नहीं कि यह सबको जाहिर है किस दल में कौन राजनैतिक उद्दंडता का काम बखूबी निभा रहा है.


बहरहाल ताज़ा मामला नीतीश - मोदी विवाद है . क्या इस मामले के कोई नैतिक मायने हैं .इस पूरे मामले में राजनैतिक नैतिकता कहीं नहीं दीखती. बहुत से विवाद ऐसे खड़े हो रहे हैं जैसे कल ही कोई राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री विपक्ष के खेमे से आकर स्थापित हो जाएगा जबकि देखा जाए तो आज विपक्ष के पास ऐसा कोई दमदार नाम ही नहीं है जो पीएम और राष्ट्रपति के लिए दमदारी से रखा जा सके . नीतीश ने बे - समय पीएम की चर्चा क्यों की. नीतीशकुमार एनडीए के प्रमुख और बड़े नेता हैं राजनीति के समझूं हैं लेकिन नरेन्द्र मोदी का नाम चला तो वे एकदम फिसल पड़े ,गोया कल ही कोई नरेन्द्र मोदी पर सहमति बन जाएगी और वे पीएम् हो जायेंगें . सहमति की राजनीति जब आप कर रहे हैं गठबंधन के गठजोड़ में हैं तो आप बाहर आकर कैसे फूफकार सकते हैं ,ऐसा कोई कर रहा है तो इसमे न कोई नीति है , न शिष्टता है और न सहमति है . जो है तो वह सिर्फ नाराजी है, गुस्सा है या चाल है लेकिन यह सब भी उद्दंडता तक पहुँच गया है .राष्ट्रपति के लिए भी असहमति भीतर से नहीं निकली है बाहर से भीतर गयी है ,आखिर यह सब क्या है ? नीतीश के बाद शिवानन्द तिवारी यदि मुखर हुए हैं तो किस राजनीति के चलते ?


संघ ने हिंदुत्व की वकालत की तो कोई नया नहीं किया इसलिए कि उनका अजेंडा ही हिंदुत्व है और यह उनका खुला अजेंडा है , यह कहना भी गलत है कि संघ ने मोदी का बचाव किया है . संघ ने सिर्फ अपनी नीति का बचाव किया है और चर्चा में मोदी थे इसलिए यह मोदी का बचाव दीख रहा है . मीडिया के जो लोग यह हल्ला मचा रहे हैं कि संघ ने मोदी का बचाव कर मोदी के प्रति समर्थन जाहिर किया है वे सब कच्ची पत्रकारिता कर हैं और रीति नीति की व्याख्या कर ही नहीं रहे हैं . दरअसल आज पत्रकारिता भी राजनैतिक उद्दंडता का हिस्सा बन गयी है इसमे समझ कम और उत्तेजना ज्यादा है ऐसा माहौल न विकास कर पाता है और न ही दिशा तय कर पाता है .


दरअसल गठबंधन आज तात्कालिक मायनों से चल रहे है इसमे वफ़ा का स्थान है ही नहीं .सबकुछ निजी स्वार्थ और हित के अनुसार चलाया जा रहा है और लोग अपनी अपनी राजनीति कर रहे हैं इससे राजनीति का नुकसान हो रहा है . नीतियों की गहराई कहीं नहीं है और सतह पर बढ़ती उद्दंडता इसे ख़त्म करने पर तुली है आश्चर्य यह है कि इस अनैतिक काम में बड़े राजनेता भी जुटे हैं .


surendra.bansal77@gmail.com

Sunday, 17 June 2012

प्रणब का राजनैतिक रिटायर्मेंट

प्रणब का राजनैतिक रिटायर्मेंट

अब यह तय है कि राजनैतिक हुनरबाज़ प्रणब मुखर्जी देश के तेरहवें राष्ट्रपति हो सकते हैं , यूपीए ने उनके नाम पर मोहर लगा कर उन्हें देश का प्रथम नागरिक होने की मान्यता दे दी लेकिन इसके साथ ही यह भी तय हो गया कि २०१४ में उनकी संभावित प्रधानमंत्री की अंतर्उपजती भावना लगभग समाप्त हो गयी है , जाहिर है देश का प्रधान होने का राज़ दायित्व अब उनके पास नहीं आ सकेगा .


प्रणब मुखर्जी १९६९ में जब राज्य सभा के लिए चुने गए तब से आज तक उन्होंने केंद्र सरकार में विभिन्न पदों पर रहकर महत्वपूर्ण मंत्रालयों और आयोगों का काम संभाला है . वे रक्षा मंत्री भी रहे ,विदेश मंत्री भी और वित्त मंत्री भी रहे हैं . और यह मामूली नहीं है इसलिए भी कि उनका यह तजुर्बा ५३ वर्षों के राजनैतिक जीवन से तैयार हुआ है . हालाँकि राजनीति में विवाद न हो ऐसा होता नहीं है और आरोप भी लग जाते हैं . उनके साथ भी ऐसा ही हुआ है . इंदिरा गाँधी की मौत के बाद १९८४ में उन्हें राजीव गाँधी ने अलग थलग कर दिया था वे कांग्रेस से हटकर राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस के नाम से नई पार्टी भी खड़ी कर चुके थे लेकिन जब नरसिम्हाराव आये तो उन्होंने प्रणब दा को योजना आयोग में अध्यक्ष बना कर फिर कांग्रेस में शामिल कर लिया . जाहिर है वे कांग्रेस के बागी रहे हैं और राजीव से उनके मतभेद भी रहे हैं और सोनिया गाँधी भी इस बात को जानती हैं फिर भी उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है तो इससे कांग्रेस को कुछ फायदे है . 

पहला तो यह कि कांग्रेस के पास उनकी पार्टी के भीतर प्रणब मुखर्जी से बेहतर कोई उम्मीदवार था ही नहीं , दूसरा फिर उन्हें उस नाम पर विचार करना होता जो प्रणब से बेहतर तो होता लेकिन पार्टी से बाहर से होता , तीसरा डॉ अब्दुल कलाम जो सर्वसम्मत उम्मीदवार हो सकते थे वे पार्टी से बाहर और एनडीए के समर्थन से राष्ट्रपति हो चुके हैं .इसलिए हर हाल में कांग्रेस के लिए फायदेमंद यही था कि प्रणब मुखर्जी का नाम आगे लाया जाए ,इससे कांग्रेस को सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि उसका एक बड़ा नेता प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर हो गया है , इससे पार्टी संभावित विवाद से भी बच गयी है . मनमोहनसिंह दो कार्यकाल पूरे कर रहे है तीसरी मर्तबा वे शायद ही बनाये जाते ऐसे में किसी एनी नाम को विचार में लाना ही होता . और कांग्रेस के भीतर प्रणब मुखर्जी के नाम पर चर्चा करना और उन्हें ही मंज़ूर करना एक मजबूरी होती , शायद वे ही अगले प्रधानमंत्री होते , इस पर अब विराम लग गया है . अब मनमोहनसिंह तीसरी बार प्रधान होने का इतिहास बना सकते है या कोई और के लिए जगह बन गयी है यह साफ़ हो गया है .

देश का सर्वोच्च होना गौरवमयी हो सकता है लेकिन देश का प्रधान होना उस राज़ तंत्र का प्रमुख होना है जो लोकतंत्र से चलता है , इसलिए लोकशाही का राजा तो प्रधानमंत्री ही होता है जो कभी गुमनाम नहीं होता अपने नैतिक राजधर्म से देश को संचालित करनेवाला वह प्रमुख व्यक्तित्व होता है , प्रणब मुखर्जी के लिए यह अवसर लगभग चला गया है वे सर्वोच्च तो हो जायेंगें लेकिन फिर भी देश के प्रधान होने का राजनैतिक कर्म अब वे शायद नहीं कर पायेंगें .इसे उनका राजनैतिक रिटायर्मेंट कहे तो अनुपयुक्त नहीं होगा ,जिसे कांग्रेस पार्टी ने उन्हें प्रदान कर दिया है .

Saturday, 26 May 2012


आखिर कब बदलेगी ये ठगस्वरुपनी राजनीति 

पेट्रोल की कीमतों में अप्रत्याशित  वृध्दि से जहाँ सारा देश स्तब्ध है वहीँ राजनैतिक दलों के आचरण पर भी हैरानी हो रही है . आज कोई आवाज़ ऐसी कहीं नहीं है जो आम लोगों के मुद्दे पर सरकार को हिला दे . सरकार ऐसी नहीं है जो आम लोगों के हित के फैसले करे. आम लोग ऐसे नहीं है जो इन लोगो से निबटने और दो चार होने का माद्दा रख  सके .ये   ठगस्वरुपनी राजनीति  है जो चल रही है  .  इसलिए देश में मनमोहन के मनमर्जी की सरकार चल भी रही है और फलफूल भी रही है . यूँ कांग्रेस को इस बात के लिए बधाई दी जाना चाहिए कि पक्ष विपक्ष के तमाम लोग और यहाँ तक कि मीडिया भी उनके स्थापित प्रधानमंत्री को एक ईमानदार प्रधानमंत्री मानता है और आश्चर्यजनक यह भी कि इस सरकार में  तमाम बड़े घोटालों और आरोपों के वाबजूद भी . इससे क्या समझा जाए यह बड़ा मौजूं है .

चूँकि प्रधान मनमोहन हैं इसलिए सरकारी मनमर्जी भी उनकी ही मानी जाना चाहिए लेकिन मौजूं  यह है कि यदि घोटाले है ,आरोप हैं फिर भी वे यदि ईमानदार हैं तो आखिर वे हैं क्या  ? वे आरोपियों को पकड़ नहीं सकते , घोटालों को रोक नहीं सकते , देश में अपनी ईमानदारी को चला नहीं सकते फिर वे आखिर कर क्या सकते हैं ,और कर क्या रहे हैं हैं ? वे इतने असहाय क्यों हैं और नाकाबिल सूबेदार क्यों नज़र आते हैं . क्यों उनका मन मौन ही रहता है और उनका मोहन  राष्ट्र से मोह क्यों नहीं कर रहा है आखिर किस मनमोहिनी के चक्कर में मनमोहन हैं. शायद उनकी मनमोहिनी प्रधानमंत्री बने रहने की है और इसमे वे सफल हो रहे हैं . एक मीडिया चैनल पर कोई महिला चीख कर कह रही थी हमें उम्मीद थी कि ये अर्थशास्त्री प्रधान मंत्री हैं . देश के लिए कुछ करेंगें लेकिन लगता है ये अर्थशास्त्र के फैलुयर स्टूडेंट हैं . देश को सबसे ज्यादा समय तक अपने राज़ में रखने में कामयाब कांग्रेस पार्टी को भी लगता  है उन्हें सबसे काबिल प्रधानमंत्री मिला है , एक ऐसा प्रधान बड़ी मुश्किल से मिलता है जो मनमर्जी से नहीं चलता , जिसकी ईमानदारी का डंका बजता है , जो किसी तरह की राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहीं रखता है , न अपनी ताकत बढाता है और न ही किसी को कमज़ोर करता है . इस काबिलियत के चलते ही वे दोबारा प्रधानमंत्री चुन लिए गए ,और हो सकता है कि मौका मिला तो तीसरी बार भी प्रधान हो जांयें .

लेकिन देश के इस हालात पर सिर्फ सरकार ही नहीं देश का हर राजनैतिक दल भी जिम्मेदार है कोई राजनैतिक दल आज आम लोगों के लिए  राजनीति कर रहा हो ऐसा नहीं लगता , इस समय हर कोई अपना राजनैतिक नुकसान बचाने में लगा है सारी कवायदें आम के लिए नहीं आम लोगों के जरिये अपना वजूद अपना ,अस्तित्व, अपनी पहचान और सबसे ज्यादा अपना राजनैतिक नुकसान बचाने की है .देश का सबसे बड़ा विपक्षी दल भाजपा मुंबई में कार्यकारिणी की बैठक कर सरकार पर गुर्रा रही है लेकिन उसे अपनी बैठक में आत्मवलोकन करना चाहिए था. बीते चार पांच सालों में उसने आम लोगो के हित में राष्ट्र हित में कितने मुद्दे उठाये , कितने आन्दोलन प्रदर्शन किये ,कितने मामलों पर सरकार को संसद में घेरा , कितना हंगामा किया उन सबका का क्या अंजाम रहा ,सरकार को कितना झुकाया उससे ज्यादा कितना उसने आम लोगों का साथ दिया , इसका सक्सेस रेट क्या है , राजनीति के शुचि तत्वों से  कितना दूर रहे और क्यों रहे , कैसी राजनीति और कैसे राजनेता हम दे रहे हैं इस पर विचार घर के भीतर होता है लेकिन भाजपा अपनी कार्यकारिणी की बैठक में कोसने की राजनीति कर रही है और इसमे उसके तमाम बड़े नेता शामिल है .यही हाल ममता बनर्जी के तृणमूल की ,वाम दलों की ,एनडीए के घटक दलों की ,यूपीए के दलों की है . कोई राजनैतिक दल आज आम लोगो के साथ नहीं आम लोगों के बहाने अपने नुकसान को बचाने में लगा है .

इसलिए यह जरुरत आन पडी कि कोई आम जन से ऐसा नेता उभरे जो आम लोगों की भावनाओं का नेतृत्व कर सके .इस सोच को अंजाम देने के लिए महाराष्ट्र के सामाजिक नेता अन्ना हजारे को आगे लाया गया , भ्रष्टाचार के मुद्दे पर  जितना हो हल्ला हुआ वह ऐतिहासिक  था , हज़ारों लोग ऐसे ही सड़कों पर नहीं आ जाते तुलना भी यूँ ही गाँधी से नहीं हो जाती  लेकिन यहाँ भी राष्ट्र और लोग ठगा गए . इस आन्दोलन से भी जुड़े लोगों ने  महज़ अपने को स्थापित करने का काम ही किया , सबने अपने को बचाने की कोशिश  की और समझोते कर वापस लौट गए . जैसे आंधी आती है तो लौट भी जाती है उसी तरह यह आन्दोलन लौट गया अब फिर लौटेगा यह आन्दोलन तो क्या पता किस अंजाम तक जायेगा या लौट - लौट कर आता रहेगा .

आम जन भी जितना परिपक्व दीखता है उतना है नहीं . राजनीति की मोहक  चालों में वह फंसता रहा है और पिटता रहा है . राजनीति ने आज लोगों को भी बेदम कर दिया है . ३१ मई को भारत बंद है राजनैतिक दल अपनी ताकत बतायेंगें लेकिन क्या होगा अंजाम , क्या हम फिर ठगे जायेंगें , आखिर कब बदलेगी ये ठगस्वरुपनी राजनीति   , जागो भारत जागो !
सुरेन्द्र बंसल 

Saturday, 31 March 2012

सच देखकर आँखे मूंद लेना ईमानदारी नहीं है.



जी आप मान सकते हैं हमारे रक्षा मंत्री ईमानदार हैं , हमारे सेनाध्यक्ष का बयान भी एक ईमानदार प्रयास है और देश में अब तक के एक सर्वाधिक ईमानदार प्रधानमंत्री काम कर ही रहे रहें .फिर भी देश में अब तक के सबसे बड़े घोटाले सामने इतने  ईमानदार लोगों के बीच ही आयें है , पता नहीं बहुतेरे ईमानदार लोगो के मध्य कुछेक बेईमान कैसे देश को पलीता लगा रहे हैं .रोज़ हजारों करोड़ के घोटाले सामने  आने की रफत जनता की बन गई है और वह सब सहते चली जा रही है . राजीव गाँधी महज़ ६५ करोड़ के बोफोर्स तोप घोटाले से सांसत में आ गये थे अब यह कथित घोटाला लगता है जीरे बराबर था , इतने छोटे घोटाले आयें तो शायद अब लोग घोटाला ही नहीं माने. यह भी हो सकता है छोटे मोटे घोटाले रोज़मर्रा की  तरह हो भी रहे हो और उन पर किसी का ध्यान जा ही नहीं रहा हो .
बहरहाल रक्षा मंत्री और सेनाध्यक्ष कुछ विवाद के बाद देश हित में एक जुट दिखने लगे हैं . दरअसल यह घोटाला नहीं है यह घूस की  पेशकश है जो देश के सबसे बड़े रक्षा संस्थान के सुप्रीम को पेश की गयी थी . इसमे अब कोई यह विवाद नहीं है कि यह सच था या झूठ . क्योंकि अब यह तय हो चूका है कि ऐसा कुछ उन दिनों हुआ था जो रक्षा मंत्री समेत तमाम लोगों के बीच भी एक शिकायत के तौर पर आया था  जाहिर है सेनाध्यक्ष ने जो आरोप लगाया है उसकी सच्चाई से कई लोग वाकिफ हैं . मामला २००९ से चल रहा है .७०० टेट्रा ट्रक खरीदी के बदले सिर्फ सेनाध्यक्ष को ही १४ करोड़ रुपये बतौर घूस देने की  पेशकश मामूली नहीं थी यह रकम और भी ज्यादा हो सकती है यदि ऐसी ही पेशकश डील से जुड़े रहेने वाले अन्य पक्षों को भी की गयी हो , इसकी पड़ताल तो अभी हुई ही नहीं है और कहीं चर्चा भी नहीं है लेकिन किसी डील में कोई एक पक्ष ही नहीं रहता उसके अनेक स्तर होते है और लोबिस्ट सभी स्तर पर कोशिश और तैयारी  करते हैं दूसरे पक्ष अभी जाहिर नहीं हुए है हो सकता है घूस देने का मामला आने वाले दिनों में कुछ बढकर मालूम हो .
जो भी हो सेना के भीतर के  सर्वोच्च कक्ष से अत्यंत संवेदनशील खबर बाहर आई है. इससे चिंताएं बड़ी हैं और खबरदार  रहने की  भी अधिक जरुरत है . इसकी दो वजहें हैं - एक- अत्यंत गोपनीय संस्थान के भीतर ऐसे लोगो की पहुँच जो पैसे के बल पर कुछ भी खरीदने की हिम्मत रखते हैं , दो - ईमानदार लोग बेईमानों को देखकर और पहचानकर भी आँखें क्यों मूंदे रहते हैं ..ये दोनों ही वजहे बड़ी चिंता देने वाली है . पता नहीं कब से कितने लोग सेना के भीतर ऐसे प्रयास करते रहे होंगें और सवाल यह भी है कि  क्या बरास्ता खरीदारों के दुश्मन भी अंदर तक पहुंचे है  दूसरा ऐसी ईमानदारी  क्या काम की जब बेईमान आपके सर पर खड़े हों आप उन्हें पहचान रहे हों और फिर भी आप चुप और मौन हो इस खुशफहमी से कि  आप ईमानदार है . जो पक्ष जितने  भी घोटाले  हुए है या उसके प्रयास हुए है जानते हुए भी आँखे मूंदे रहे हैं उन्हें कैसे कहे कि वे ईमानदार है , सच देखकर आँखे मूंद लेना कहीं भी ईमानदारी नहीं है..
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JADU



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JADU 

Sunday, 4 March 2012

किस मोड़ पर जायेगी राष्ट्र की धारा !

किस मोड़ पर जायेगी राष्ट्र की धारा !

गंभीर आरोपों से केंद्र सरकार को झकझोरते हुए समयकाल के बीच पांच राज्यों में चल रहे चुनावी संग्राम का समापन हो गया , नतीजे मंगलवार को आने लगेगें . गोवा और मणिपुर ज्यादा चर्चित नहीं रहे , लेकिन पश्चिमोत्तर सीमा के पंजाब, उत्तराखंड,और उत्तरप्रदेश के चुनावी शोरगुल से पूरा देश दबा रहा , इस बीच हो हल्ले वाले विषय भी दब गए और बड़े बड़े घोटाले जाने कहाँ खो गए. वक़्त मीडिया के लिए और नेताओं के लिए भी चुनावी हो चला था और इस चुनाव में भ्रष्टाचार से बढकर जातिवाद , जोड़ तोड़ , बहुबल और धनबल ही था सो सबने इसी का इस्तेमाल किया और जोर लगाया .मीडिया भी इससे अछूता नहीं रहा 
भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण के विरोध में चले अभियान पर पनपे महा जन-रोष  के बाद हुए इस चुनाव में धारणा थी कि आक्रोश इतना फूट पडेगा कि राजनेताओं को भागना पड़ेगा और इन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़ना पड़ेगा . लेकिन ऐसा हुआ नहीं. खासकर उत्तरप्रदेश जैसे महा राज्य में जहाँ से राज्य के साथ साथ केंद्र की सरकार बनाने और बिगड़ने की संख्या ज्यादा है ,आखिर 85  सांसद उत्तरप्रदेश से चुने जाते हैं ऐसे में उत्तरप्रदेश का राजनैतिक महामहत्व है . और इसिलए मुद्दे वहां से उठे तो इसे राष्ट्रीय मुद्दे माना जाना चाहिए .

मुद्दे तो बनते है और लोग जब उससे जुड़ते जाते हैं तो ऐसे मुद्दे निर्णायक हो जाते है पहले भी बड़े आन्दोलन जब भी हुए उत्तरप्रदेश का उसमे योगदान रहा और उत्तरप्रदेश ने केंद्र और राज्य दोनों तरफ ज्वलंत मुद्दों पर अपनी बे -बाक राय जाहिर करते हुए सत्ता परिवर्तन भी किया . इस बार ऐसा नहीं लगा कि अन्ना हजारे के विशाल जनांदोलन और आन्दोलन को मिले समर्थन के बाद यहाँ भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा बन गया हो.इसकी कहीं कोई ललक और लहर नहीं दिखी हालाँकि ६ मार्च दिखाएगा कि यह दिन चौकानेवाला है या नहीं , फिल वक़्त  ऐसी कोई खबर नहीं है . इसलिए यह चौकानेवाली बात है कि इस महा चुनाव में मुद्दे जो राष्ट्रीय धारा से उपज रहे थे वे आखिर  कहाँ खो गए लगते हैं .लोकतान्त्रिक राज़ में मुद्दों का खो जाना या उनका असरकारक नहीं बनना चिंता की बात है .

चिंता यह नहीं कि मुद्दे ये क्यों नहीं बने , चिंता का लोकतंत्र पर खतरा यह है कि मुद्दे वे बने जो लोक को एक कर तंत्र बनाने की इच्छा नहीं रखते वे लोक को बांटकर तंत्र का ख्वाब तैयार करते हैं . उत्तरप्रदेश में यही हुआ , जो बंटाओ हुआ वह जातिगत हुआ और वोट कबाडने की नीति भी सामाजिक बंटाओ के मुद्दे पर आधारित रही यही वजह रही कि राष्ट्रीय दल जिनमे कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी परतिया भी हैं उन्होंने इन्हीं मुद्दों पर अपने को क्षेत्रीय दलों में बंधित कर लिया और उन्ही आधार पर वहां चुनाव लड़ा ,यह सर्वाधिक चिंतनीय होना चाहिए , उत्तरप्रदेश में हर कोई लोगो को उसके जाति और जमात  के आधार पर बांटने में लगा रहा . ये चुनाव आखिर राष्ट्र की धारा को किस मोड़ पर ले जायेंगें .

सुरेन्द्र बंसल 

Saturday, 18 February 2012

जिम्मेदार तो दल हैं ....


 जिम्मेदार तो दल हैं....



चुनाव आयोग की नज़र में सलमान खुर्शीद आये तो सलमान साहब ने कानून मंत्री रहते हुए जो  गलती की थी उस पर चट-पट माफी मांग ली .उन्हें आयोग का नोटिस  मिला था . फिर एक और मंत्री और उत्तरप्रदेश के खास चुनाव रणनीतिकार बेनीप्रसाद वर्मा ने वही गलती दोहरा दी , लगभग  सलमान खुर्शीद के अंदाज़ में ही , उसी तेवर में और उसी मंशा से . उन्हें भी आयोग का नोटिस मिला और कड़कनाथ   से  नरमनाथ    होते हुए उन्होंने भी कह दिया जबान फिसल गई थी .
सलमान  और बेनी बाबू  दोनों  केंद्र में मंत्री हैं दोनों की गलती भी एक सी ही थी , दोनों ने मुस्लिम आरक्षण की बात भी बढ़चढकर की थी , दोनों एक ही पार्टी कांग्रेस के नेता हैं जो राष्ट्रीय राजनैतिक दल है दोनों का अपराध यदि था तो एक जैसा . याने एक ही पार्टी के बड़े नेता एक जैसी समानता वाले कथित अपराध एक के बाद दूसरे ने किये हैं . चुनाव के दौरान जब इतनी समानताएं एक ही राज नैतिक दल के एक से अधिक नेताओं में परिलक्षित  होती है तो उसे गलती नहीं स्ट्रेटेजी कहना और मानना चाहिए . सलमान के बाद अगर बेनी बाबू बोले हैं तो यह साफ़ तौर पर यह पार्टी की चुनावी नीति है . ऐसा कैसे हो सकता है जब एक नेता ऐसा विवादित बयान दें जो आयोग की नज़र में आचारसंहिता का उल्लंघन हो और उसके लिए उन्हें चेतावनी दी जा रही हो तब ही  कोई दूसरा नेता चुनाव के चलते ही उस बात को दोहराए तो इसे पार्टी की रणनीति ही मानना चाहिए  . कांग्रेस आज इस आरोप से बरी नहीं हो सकती , 
यह इसलिए भी कि ऐसे मौके पर पार्टी अपनी उपस्थिति और प्रभाव का इस्तेमाल कर प्रचारकों को दिशा निरेद्श और गाईड जारी करती है . क्या मुस्लिम आरक्षण पर कांग्रेस पार्टी की वाकई कोई नियोजित रणनीति थी यह सवाल अब जरुर वहां तक देखा जाना चाहिए जिस समयकाल में इस तरह के बयानों का इस्तेमाल मतदाताओं  को लुभाने के लिए किया जाता है .उत्तरप्रदेश यूँ भी जातियों पर आधारित राजनीती का अखाडा है जहाँ ऐसे बयानों और घोषणाओं का अच्छा  प्रभाव और सीधा प्रभाव पड़ता है .इसलिए आयोग को इसे उस राजनैतिक दल की रणनीति के रूप में परखना और जांचना भी चाहिए उसी अनुरूप जिम्मेदारी तथा दंड भी तय करना चाहिए .
लेकिन चुनाव आयोग का काम टी एन शेषन  के बाद  उतना मुस्तैद और धमक वाला नहीं रहा ,इसलिए ऐसे आचरण संहिताओं के उल्लंघन के मामले  चुनावों में फिर आम हो चले हैं . सलमान खुर्शीद ने संहिता उल्लंघन का अपराध यदि किया था तो आयोग उसे माफ़ कैसे कर सकता है . चुनाव के दौरान ऐसे स्थितियां जिनसे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित ही रही हो उस पर चुनाव आयोग को माफ़ करने के बजाये फैसले लेना चाहिए .ये फैसले माफ़ी के नहीं होते हैं ,ऐसे फैसले सिर्फ दोष या निर्दोष तय करने के होना चाहिए . सलमान हुर्शीद यदि दोषी थे तो आयोग का फैसला भी वही आना चाहिए था और यदि वे निर्दोष थे तो फैसल तदनुसार  ही होना चाहिए . ऐसे गलतियों के लिए माफ़ करने का क्या काम .?
चुनाव आयोग ने सही फैसला  लिया होता तो आज बेनीप्रसाद वर्मा फिर चुनाव में उसी मुद्दे का बेजा फायदा लेने की हिम्मत नहीं करते .अब उन्होंने कह दिया है उनकी जबान उस तरह फिसल गई थी जैसे कोई जमी हुई चिकनी काई पर पैर रख फिसल जाता है , बेनी वर्मा के पैर जबान  रखने से फिसली है अब जब तक उन पर कारवाई होगी या न होगी तब तक उत्तरप्रदेश में चौथे  चरण के भी चुनाव हो जायेंगें . आयोग भी  माफ़ कर देगा ,. पर इस बात को कौन देखेगा कि अब कोई सलमान या बेनी खड़ा होकर फिर ऐसी बात नहीं कहेगा . क्या ऐसा कोई माप दंड चुनाव आयोग के पास है?
जरुरी यह है कि ऐसे मौके पर उस मान्यता  प्राप्त राजनैतिक दल को जिम्मेदार माना जाना चाहिए जिस दल से प्रचारक चुनावों को प्रभवित करने के लिए आचरण संहिता की धज्जियां बेख़ौफ़ उड़ाते हैं ,आखिर  जिम्मेदार तो रणनीतिकार राजनैतिक दल हैं .

Saturday, 11 February 2012

राजनीति की अनैतिकता


पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव की गहमा गहमी सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में नज़र आती है जो सबसे बड़ा भौगोलिक और राजनैतिक प्रदेश है . बावजूद इसके उत्तरप्रदेश जितना राजनैतिक सक्रियता के लिए जाना जाता है उससे कहीं अधिक आज वह सम्प्रदाय , जात और धर्म में बंटता नज़र आ रहा है . ऐसा नहीं लगता कि कोई नैतिक राजनीति का गुर यहाँ काम करेगा ,उत्तरप्रदेश के जीत हार के गणित बहुतेरी सीटों पर साफ़ साफ़ निर्णय देते दिख रहे हैं ऐसे में मुद्दे और विकास की धारणाएं चुनाव के नतीजों के लिए कोई मायने नहीं रखती . यहाँ २ चरणों के मतदान पूरे हो गए और कहीं कोई विश्वास नज़र नहीं आ रहा है .

दरअसल राजनीति का नैतिक मूल्य विचारधाराओं और सामाजिक प्रतिबध्दताओं का फलित मूल्यांकन है , इसी के आधार पर जो समूह एकत्र होता है वह दलीय राजनीति का गठन करता है . आज बहुतेरे राजनैतिक दल चुनाव का हिस्सा हैं लेकिन इनमे राजनीति का नैतिक मूल्य कहीं अब नज़र नहीं आ रहा है , खास तौर पर उत्तरप्रदेश जैसे विशाल राजनैतिक प्रदेश में राजनीति के नैतिक मूल्य कहीं नहीं दिख रहे हैं .कहने को कांग्रेस और भाजपा जैसे भीमकाय राजनैतिक दलों के साथ बसपा , सपा , लोकदल , और अनेक छोटी छोटी पार्टिया उत्तरप्रदेश पर सत्ता का भोग चाह रही है . उत्तरप्रदेश पर बार बार राज करने वाली मायावती, कांग्रेस के लिए फिर जमीन जोतने वाले राहुल गाँधीके अलावा मुलायम सिंह , अमरसिंह , अजीतसिंह. सलमान खुर्शीद , बेनीप्रसाद वर्मा , उमा भारती , विनय कटियार,कलराज मिश्र , राजनाथ सिंह, कल्याणसिंह,लालजी tandon समेत तमाम ऐसे नाम हैं जो राजनीति के प्रमुख लोगों में से हैं फिर भी राजनीति की चाल उसके मूल्यों पर चलती नज़र नहीं आ रही है .
राजनीति की नई- नवेली प्रियंका गाँधी ने इसे रायबरेली में नकारात्मक राजनीति कहा है और अपने को बचाते हुए दूसरों पर उन्होंने हमला भी किया है पर यह नकारात्मकता नहीं राजनीति की अनैतिकता है जिसमे उनका अपना दल कांग्रेस भी शामिल है .जब मूल्य टूट जाते हैं तब अनैतिकता का जन्म होता है और वह बढ़ते जाती है ,उत्तरप्रदेश में इसी बढ़ी हुई अनैतिकता के सहारे सभी राजनीति चला रहे हैं और इसी के बूते चुनाव जीत लेना चाहते हैं . कोई भी मुद्दों को लेकर चुनाव में नहीं है इसका सबसे बड़ा सबूत ऐसे उम्मीदवार हैं जो जाति ,धर्म ,बाहुबल ,गुंडई और काले धंधों के वाबजूद सभी राजनैतिक दलों से खड़े हुए हैं . जाहिर है कोई भी राजनैतिक दल इन दागियों की अनदेखी नहीं कर सका है और इन्ही लोगों को विधानसभा में भेजकर चुनाव तर जाना चाहते हैं .फिर कोई कैसे कह सकता है कि वे विकास के नाम पर राज करना चाहते हैं .
राजनीति की अनैतिकता सिर्फ जाति ,धर्म के आधार पर ही नहीं है यह कसौटी तो महज़ चुनाव लड़ने का मुद्दा है ,अनैतिकता तो तब शुरू होती है जब भिन्न भिन्न राजनैतिक दल तलवारें भांज चुनाव लड़ते हैं अपने अपने घोषणा पत्र पर चुनाव लड़ते हैं फिर बहुमत नहीं मिलाने पर गठबंधन बना लेते हैं और सत्ता पर काबीज हो जाते है . यह राजनीति की सबसे बड़ी अनैतिकता है और मतदाताओं के साथ खुली ठगी व् विश्वास घात है .जब आपको गठबंधन के लिए चुना ही नहीं गया तो कैसे आप गठ्बंभन सरकार बना सकते हैं . चुनाव आयोग को इस पर विचार करना चाहिए कि किसी भी तरह का गठबंधन चुनाव पूर्व ही बने और मान्य हो .चुनाव बाद का गठबंधन अनैतिक राजनीति मानी जाना चाहिए . यह जरुरी है . केंद्र में जो भी सरकारें बन रही है वे इसी अनैतिक राजनीति का सहारा ले रही है .
उत्तरप्रदेश में सभी दल दावा कर रहे हैं कि वे अपने बूते पर सरकार बनायेंगे इनमे वे दल भी है जो केंद्र में एक साथ है और यू पी में अलग चुनाव लड़ रहे हैं . अब जबकी यू पी में किसी दल को बहुमत नहीं मिलाने के समाचार आ रहे हैं अनैतिक राजनीति से सत्ता बनने के आसार बढ़ रहे हैं ऐसे में राजनैतिक दलों के कोई मायने नहीं रह जाते .

सिफर

कई दिनों से कोई
नहीं आया सपना,
फिर अभी अभी ही
किसी तरह बन गया
उम्मीद का नया सपना ,
मूरत कुछ आश्चर्य  सी 
लिए हुए अपने साथ
आँखों में समां गया
क्यों ???
जाना था टूट उसे अगर
तो नींद में खलल कर
क्यों दिखाई नई डगर
रास्ते टूट जाते हैं
मुद्दत के बाद मगर
जिन रास्तों से
गुजरा ही नहीं मैं ,
वे क्यों बिखर गए ?
सुरेन्द्र बंसल
११फ़र.१२ 

Monday, 6 February 2012

ये दाग पक्के हैं


पटियाला हाउस की अदालत से गृहमंत्री और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम को तो राहत मिल गयी लेकिन २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़े महतवपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह  तय हो गया कि दाग तो पक्के हैं . पांच राज्यों में चुनाव का दौर चल रहा हे ऐसे में अदालत ने सुब्रमण्यम स्वामी की वह याचिका रद्द कर दी  है जिसमें चिदम्बंरम को ए . राजा के साथ सह - अभियुक्त बनाये जाने की मांग थी तो यह सुकून सिर्फ  कांग्रेस के भीतर का है कि वह एक और संकट से बच गई लेकिन ११ कंपनियों को १२२ लायसेंस बांटने  के मामले से सरकार बरी नहीं हुई है. 

2g पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पर्याप्त है यह तय करने के लिए कि 'पहले आओ पहले पाओ ' के आधार पर लायसेंसे बात देने की प्रक्रिया एक बड़े  घोटाले  का आधार है. जिसे बड़ी बड़ी कंपनिया समझ रही थी कि 2g स्पेक्ट्रम लायसेंस कबाड़ कर वे हज़ारों करोड़ मिनटों में कमा सकते है वह केंद्र में बैठी सरकार और उनके धुरंधर महारथी क्यों नहीं समझ सके. केंद्र  के  सबसे  सिपहसलार  कपिल  सिब्बल अब भी सीना तान कर खड़े हैं यह जतलाने के लिए कि घोटाला हुआ ही नहीं है और चिदंबरम निर्दोष हैं . सिब्बल बड़े वकील हैं जानकार है और समझदार हैं इसलिए लगता है कांग्रेस उनको आगे कर अपना बचाव मज़बूत करना चाहती है लेकिन कपिल सिब्बल को एक वकील की तरह लगता है कि उनकी ड्यूटी सिर्फ पार्टी को बचाने के लिए लगाईं गयी है इसलिए वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी यह मानने को तैयार नहीं है कि कही कुछ गड़बड़ हुई है . 

अदालत का फैसला साफ़ है कि लायसेंस वितरण में नीतिगत प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ है . यही संकेत हैं कि 2g  स्पेक्ट्रम में बड़ा घोटाला  हुआ है जो करीब पौने दो लाख करोड़ का है . इतनी  रकम सरकार के खजाने आ सकती थी और यह नहीं आ सकी है तो कोई न कोई तो इसका जिम्मेदार है यह जिम्मेदारी ए.राजा या चिदंबरम पर ही नहीं पूरी सरकार पर आती है , आखिर सरकार  को बड़ी चोट लग रही है तो क्यों ? यह तो समझा और विचारा जा सकता था लेकिन क्या ए राजा तक ही मामला रहा और पूरी सरकार से छिपा रहा ऐसा नहीं हो सकता आखिर घोटाले के तत्व जिम्मेदार तत्वों केच्साथ मिले रहे इसलिए उन कंपनियों का काम बन गया जो हज़ारों कमा कर अब सरकार को कोस रही है कि भारत में निवेश का अच्छा माहौल नहीं है. 

जाहिर है घोटाले हुए हैं और उसके पीछे बड़े भ्रष्टाचार कि कहानी छुपी हुई है फिर कोई कैसे माने कि कुछ हुआ ही नहीं है . कांग्रेस अब जश्न मना रही है इस बात का कि चिदंबरम बच गए हैं चुनाव में एक बड़ा बवाल खड़ा होने से बच गया पर इतने  बड़े घोटाले  का जिम्मेदार मंत्री जब जेल में हो तो कोई कैसे बच सकता है यह जिम्मेदारी तो पूरी सरकार की है , आगे और  कहानिया आयेंगी पर दाग तो स्थायी हो गए हैं कि १२२ लायसेंस बांटने की गड़बड़ी इस सरकार ने की है, इस दाग को अब छुडाया नहीं जा सकता दुःख इस बात का होना चाहिए कि इस घोटाले  में रिलायंस ,बिरला और टाटा की कंपनिया भी है , बड़ी कंपनिया जो बड़ी हो गयी है क्या उसके नेपथ्य  में घोटाले  ही होते   हैं जिनसे  वे फलफुलकर  बड़ी हो जाती   हैं यह सवाल   कौंधने लगा है क्योंकि ये दाग पक्के है जो  सरकार के साथ इन कंपनियों पर भी लगे हैं
सुरेन्द्र बंसल

Saturday, 14 January 2012

इस बढ़ती  संक्रामकता से तुम मुक्त हो जाओ पाक
पाकिस्तान  में  तख्ता  पलट की आग कुछ ठंडी पड़ी है लेकिन पाक के बड़े पदासीन लोगों ने  बीतें दिनों जिस तरह इस देश में अस्थिरता के हालात उत्पन्न किये हैं उससे न केवल पाक में आग लगी है बल्कि उसकी आंच भारत पर भी आ रही है .
ताज्जुब यह है की सरकार के अंगों की तरह कार्य करने वाली  सेना और न्यायपालिका न केवल सरकार को चेतावनी दे रही है साथ ही अपने गंभीर  मंसूबें भी जाहिर कर रही है यह उस दोहराव की स्थिति है जिसके तहत पाकिस्तान में तीन मर्तबा सेना सरकार का तखता पलट कर काबीज हुई है .अब यह स्थिति फिर बन रही है हालाँकि  फिलवक्त कुछ ठहर सी गई है ,फिर भी तख्ता पलट कर राज़ करने की संकीर्ण मानसिकता की फलफूल रही संक्रामकता से पाक अब भी मुक्त नहीं हुआ है .राष्ट्रपति जरदारी और प्रधानमंत्री गिलानी ठीक से रात गुजार नहीं पा रहे है कब उन्हें लोकतंत्र को दबोच देने वाले  ना -पाक इरादे सोते हुए ही जकड ले , यह स्थिति किसी भी देश के लिए सर्वथा चुनौतीपूर्ण  होती  है इसलिए भी कि कोई भी देश इन हालातों  में आगे नहीं बढ सकता .पाकिस्तान में जिस तरह के आज हालात है वह किसी भी सरकार के लिए मुश्किलों भरे  है ऐसे में सेना की धमकी पाकिस्तान को और गड्डे में ले जा रही है .
पाक जाए गड्डे में यह हम सोच सकते है इसलिए कि जिस तरह के सम्बन्ध हमारे पाकिस्तान से रहे हैं वे हमें पाकिस्तान का हितैषी कभी नहीं बना सकते लेकिन जो हालात आज पाक में बने हैं वे हमारे लिए भी मुसीबत  बन सकते हैं , जरुरी यह है की पाकिस्तान में चाहे जिस दल की सरकार बनें पर चुनी हुई और लोकतान्त्रिक सरकार हो, यही  भारत के लिए बेहद जरुरी है . पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि  जब जब वहां फौज ने शासन किया है , भारत के लिए उसने मुश्किलें पैदा की है .यह मुश्किलें चाहे कश्मीर विवाद की हों ,चाहे इस बहाने बढ़ते आतंकवाद की हो या फिर युद्ध के हालात उत्पन्न करने की हो .पाक के तानाशाही हुक्मरानों के समय पाकिस्तान सिर्फ भारत से दुश्मनी ही करता रहा है , पाक सेना और ख़ुफ़िया एजेंसी आय एस आई  भारत में अलगाव वादियों  को उकसाने , आतंकवादियों को ट्रेनिंग देने , आतंकवादी हमले के लिए व्यूह रचने और साज़िश से युद्ध करने के लिए बदनाम है . जब जब सेना का सता पर कब्ज़ा रहा है भारत विरोधी यह अभियान पाक ने ज्यादा चलाया है
इसलिए भारत के पक्ष में यही है कि वहां जब सरकार बने जो भी सरकार बने जो भी राजनैतिक पार्टी  जीते लेकिन वह जनता की लोकतान्त्रिक सरकार हो . गिलानी के बीतें तीन साल भारत के पक्ष में रहे हैं इस बीच दोनों के दोस्ताना और व्यापारिक सम्बन्ध बड़े है और उससे ज्यादा इस दौरान भारत में आतंकी घटनाओं में बेहद कमी आई है साथ ही कश्मीर में भी घुसपैठ बहुत कम हो गयी है . इसलिए जरुरी है पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार चले और स्थिरता बनी रहे . वहां तानाशाही से पनपते आतंकवाद , युद्धवाद  के  संक्रामक वायरस भारत नहीं आयें ,साथ ही विश्व के इस सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के सभी सरकारी अंगों का मिजाज़ भी लोकतान्त्रिक बना रहे उस पर पड़ोस का असर न हो . इसलिए कामना यही हो इस बढ़ती  संक्रामकता से तुम मुक्त हो जाओ पाक .!

Saturday, 7 January 2012

कीचड में कूदने के मायने ..


यूपी में  चुनाव के पहले मायावती ने जो बल्लम घुमाया उसकी मार बीजेपी को लग रही है .बसपा के दागी और बदनाम मंत्री बाबूसिंह रघुवंशी से   पल्ला झाड़ कर मायावती ने खुद को तो बचा लिया लेकिन भाजपाई  फंस गए . बताया जा रहा है भाजपा बाबूसिंह रघुवंशी के करोडो के मोहजाल में नहीं जातिगत समीकरण के चक्कर में जा फंसी है लेकिन क्या जानकर कोई कीचड़ में कूदता है ? यह सवाल आज गर्म है .

दरअसल बाबूसिंह रघुवंशी को बसपा से निकाले जाने और भाजपा में शामिल किये जाने के गहरे राजनैतिक अर्थ है ,यह कोई वाले वाले काम नहीं हो गया है , इसकी पूरी तैयारी पहले से ही हो सकती है . यह कैसे हो सकता है कि ऍन  चुनाव के पहले मायावती अपने सबसे बदनाम और खास मंत्री को अचानक निकाल बाहर कर दे और तभी अचानक एक दरवाज़ा खुले ,और बाहर लिया गया व्यक्ति एक बड़ी पार्टी में शामिल कर लिया जाए . लगता है यह दोनों तरफ की  पूर्व तैयारी ही थी जिसे परोसा ऐसा गया है कि वह नई डिश लगे .  काशीराम के पूर्व  टेलीफोन ओपरेटर  और माया सरकार के दुधारू गाय की तरह कमाने वाले मंत्री बाबूसिंह रघुवंशी जब इअताने बदनाम हो चले की बसपा के लिए मुश्किले बन जाने की संभावना बढ़ गई तो मायावती के लिए समझदारी इसी में थी कि बाबूसिंह रघुवंशी को आउट करें .लेकिन मायावती सरकार में अकेले बाबूसिंह या  एक दो ही भ्रष्ट हों ऐसा नहीं है फिर बाबूसिंह को बाहर किये जाने के पीछे और भी कारण जरुर होंगें जो पहले से ही बन - पक रहे होंगें .

 मायावती दमदार महिला हैं वो कभी ऐसा नहीं कर सकती हैं कि फायदे की कोई चीज़ हाथ से चली जाए .बाबूसिंह से हो रहे नुकसान का सारा गणित मायावती ने जांच परख लिया होगा उन्हें जब लग रहा होगा कि बाबूसिंह रघुवंशी अभी कोई काम के नहीं हैं उन्होंने उसे बाहर कर दिया .और यह दिखला दिया कि वह दागदार मंत्रियों पर कड़ी कारवाई कर सकती हैं . इससे मायावती को दो फायदे हुए एक. नुकसान वाला काम ख़त्म हो गया . दो. भ्रष्टाचारी  पर कारवाई कर मायावती स्वयं स्वच्छ और साफ़ हो गयी हालांकी बुंदेलखंड में उनका गणित भी कुछ गड़बड़ा सकता है .
वहीँ भाजपा भी कोई ऐसे ही बाबूसिंह को तुरत फुरत अन्दर लेने को तैयार नहीं हो गयी होगी . उसकी भी पहले से ही तैयारी लगती है . किरीट सोमैय्या के मार्फ़त आरोपों के घेरे में लेने का काम भी एक साजिश हो सकती है . वह यह कि  आरोपों से मायावती को इतना गड़बड़ा दो कि बुंदेलखंड के इस  बड़े  नेता को बाहर करने के लीये मायावती मजबूर हो जाए और ऐसा हुआ जब बाबूसिंह समेत एनी भी बाहर किये गए .भाजपा की यह पूर्व तैयारी इसलिए भी लगती है कि बीते साल मार्च में मुरादाबाद के जिस मिड -टाउन क्लब में भाजपा के बड़े नेता जिनमें मुख्तार अब्बास नकवी, कलराज मिश्रा, सूर्यप्रताप शाही, मुरली मनोहर जोशी और विनय कटियार भी थे , एकत्र हुए थे वह आयोजन बाबूसिंह रघुवंशी के खासम ख़ास सौरभ जैन का था और तब सौरभ ने तीन हज़ार कार्यकर्ताओं की पार्टी करने में भाजपा पर बड़े उपकार किये थे .यहीं से वह गणित बना तैयार हो गया था जिसका परिणाम  बाबूसिंह रघुवंशी को भाजपा  में शामिल करना है . मायावती बाबूसिंह को बर्खास्त नहीं करती तब भी बाबूसिंह मायावती के लिए सरदर्द बन सकते थे और भाजपा का सुप्पोर्ट एन चुनाव के वक़्त कर सकते थे . माया ने यह सब भांप कर ही बाबूसिंह को बर्खास्त किया हो .
जाहिर है यह राजनैतिक खेल है जो पहले से ही तैयार किया गया लगता है , भाजपा बिना फायदे के एकाएक चुनाव में बदनामी  क्यों मोल लेती यह राजनैतिक दुराचार  जरुर लगता है और गडकरी चूँकि  अध्यक्ष हैं इसलिए गड़बड़ी उनकी नज़र आ रही है पर इसमे कई नेता शामिल रहे है जो रन ले लिए जमीन तैयार कर रहे थे .यह इसलिए भी कि कोई कीचड में जानकार नहीं कूदता है और कमल जो जानता है वह कीचड में ही बेहतर खिलता है वह भी ऐसे कभी कीचड में कूदता नहीं है ,यह ज़रूर कि नैतिकता की डगाल  नाज़ुक  होती है और कीचड में भी कूदने से वह धराशायी हो सकती है .
सुरेन्द्र बंसल