Thursday, 18 June 2020

मानवता का मर्म



आज ही तो दुःख

से भर गया मन,

और आंसू भी

छलक आए तब,

जब एक मित्र का

भेजा वीडीयो

अंतर्मन में बस गया

देखा वो घर के बाहर

फुगड़ी, लंगड़ी

खेलने वाली गुड़िया,

चूल्हे चौके की तपन से

बे फिक्र मुस्कान लिए,

गूंथे आटे के हाथ लिए

बाजरे का रोटला,

आंच से तपे तवे पर

नन्ही उंगलियों से

फेरे जा रही है,

इस मुस्कान के साथ

कि  कुछ ही देर में,

थक हार कर

मेहनत मजदूरी से

उसके बाबूजी

और बाईं आनेवाले हैं,

जिनके हाथों में

खून की नसें

मोटी हो चली है,

जिसमे खून कम

पानी ज्यादा है,

खाना उन्हें तैयार देना है

जिन्हें बस खाते ही

सो जाना है,

सुबह फिर जाना है

इस बचपन से

उस प्रौढ़ का है

बस इतना ही / रिश्ता

मज़बूरी का बचा है...
कल की ही तो बात है

उस युवा कवियत्री ने

न जाने किस गुमान से,

गूढ़ समझ से दूर

नाराजी के भाव से,

धिक्कारा था

और ओछी सोच से

भरपूर कह लजाया था,

बस इसलिए कि

बहुतेरे लोग जो

इस संक्रमण में

सजगता के चित्र के

चितेरें बन गए हैं,

सजधज के

सुंदर कपड़ों में

और चुपडें प्रसाधनों से

पुते चेहरे लिए ,

आलीशान कोठियों की

चमक दिखाते हुए'

चारदीवारी के पहरेदार

कर रहे हैं खबरदार

यही उनका अपना

विज्ञापन सा चेहरा,

चोंट मन को देता है

बिना समझे ही वह

ओछा हो जाता है,
ग़रीबी और शान

के बीच की यही दूरी,

इंसानियत की

बंजर जमी पर

खड़ी इमारतें हैं,

जो अपने को

दिखाने भर के है,

और अपनों को

रिझाने भर के है,

तस्वीरों में जिंदा

दिखती मानवता

तब मर जाती है..
सुरेन्द्र बंसल

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