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यथा योग्य मेरे मौलिक विचार हैं ..यह मेरी सोच का एक प्रस्फुटन है उस दिशा की ओर जहाँ प्रकृति अपनी पूर्णता और सुन्दरता का आभास देती है साथ ही यह अवसर भी देती है कि यदि विचार सुन्दर हो, कोमल हो ,उसमे तेज़ हो तो यह संसार भी उतना ही सुन्दर होगा ... Surendra Bansal
Monday, 21 May 2018
Sunday, 20 May 2018
जश्न मनाइए व्यवस्था की जीत का
जश्न मनाइए व्यवस्था की जीत का*
सुरेंद्र बंसल
कर्नाटक में बीजेपी अंदर आकर बाहर हो गयी।इसे कांग्रेस, जेडीएस की जीत और प्रजातंत्र की जीत माना जा रहा है। मैंने लिखा था थिरकते पांव में कांटे की चुभन, इस चुभन की टीस से बीजेपी बाहर नहीं हो पायी और उसके दर्द को देख कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर उसे धक्का मार दिया। लेकिन आज जब सदन में येदियुरप्पा विश्वास मत के पहले ही बाहर चले गए तो कांग्रेस और जेडीएस इसे प्रजातंत्र और उनकी जीत मान रही है यह शायद लड़खड़ाकर गिरने वाले को देख खुशी का अतिरेक व्यक्त करना है।
मैं इस आलेख से प्रजातंत्र की हारजीत को कुछ स्पष्ट कर देना चाहता हूं। जब चुनाव के परिणाम आये तब 222 विधानसभा सीटों पर बीजेपी को 104 , कांग्रेस को 78, और जेडीएस को 37 सीटों पर जीत मिली। यह खण्डित जनादेश किसी भी दल के पक्ष में नही था अलबत्ता बीजेपी जनादेश के सबसे नजदीक थी। कांग्रेस और जेडीएस साफ साफ नकार दी गयी उसे लोकतंत्र ने स्पष्ट नामंजूर किया।
सरकार किसकी और कैसे बने यह लोकतंत्र का नहीं व्यवस्था का प्रश्न बना । चूंकि राज्यपाल इस व्यवस्था के प्रथम अधिकार सम्मत अंग होते हैं अतः उन्हें ही अपने विवेक से संविधान की मर्यादा के अनुरूप निर्णय करना होता है। ऐसी परिस्थिति में संविधान यह स्पष्ट कहीं नहीं करता कि चुनाव बाद दो भिन्न भिन्न राजनैतिक दल एक हो जाये तो पहला अवसर इस नवगठजोड को देना जरूरी होगा। ऐसे में राज्यपाल वजुभाई ने कहीं गलत नहीं किया हालांकि वे इस नए गठजोड़ को भी पहले आमंत्रित कर लेते तब भी गलत नहीं होता। लेकिन राज्यपाल वजुभाई ने सबसे बड़े राजनैतिक दल को मौका दिया, इसे अनैतिक कहना अब भी अनुचित है। मेरी दृष्टि में अनैतिक तो दो हारे हुए दलों का गठजोड़ है जो नीतिगत तौर पर चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ रहे हैं और चुनाव बाद सत्ता की ललक लेकर एक हो गए है। ऐसे गठजोड़ कहीं भी हुए हैं वे सब भी एक तरह से अनैतिक और अराजक राजनीति है।
अब कनार्टक में प्रजातंत्र ने क्या कहा? प्रजातंत्र ने साफ साफ कहा उसे कांग्रेस और जेडीएस तो बिल्कुल भी नहीं चाहिये, बीजेपी को एक हद तक प्रजातंत्र ने मंजूर किया लेकिन पूरे विश्वास के साथ नहीं लिहाज़ा बीजेपी को विश्वास का मत नहीं मिला। अब जब बीजेपी सदन में बहुमत संख्या नहीं ला सकी तो प्रजातंत्र की जीत कैसे हुई। और आने वाले दिनों में मतदाताओं के सामने दुश्मनों की तरह लड़े दल एक होकर सरकार बना लेंगे तब प्रजातंत्र की जीत कैसे होगी? क्या यह प्रजातंत्र और मतदाताओं के साथ धोखा नहीं होगा? सवाल जब खड़े होते हैं तो उनके जवाब सौ फीसदी खरे और सच्चे होना चाहिए। प्रजातंत्र को यहां अपने फायदे के लिए परिभाषित करना अनुचित होगा, इसलिए कांग्रेस और जेडीएस दोनों का यह कहना है कि प्रजातंत्र की जीत हुई है तो उन्हें सरकार बनाने के दावे से सबसे पहले स्वयं को खारिज़ करना होगा क्योंकि दोनों राजनैतिक दल प्रजातंत्र से नकारे हुए ऐसे दल हैं जो दलदल से सत्ता का सिंहासन गढ़ने में लगे हैं।इसलिए भी कि कुमारस्वामी जिन्हें दोनों दल आदरभाव और सम्मान से अपना नेता और मुख्यमंत्री मान रहे हैं उन्हीं कुमारस्वामी ने कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर 70 लाख की चोरी की घड़ी पहनने का आरोप लगाकर सीबीआई से जांच की मांग की थी इसे अब क्या कहा जाए नैतिक या अनैतिकता?
बहरहाल उपसंहार से पहले बात सर्वोच्च न्यायालय की। देर रात देश के सबसे बड़े माननीय न्यायाधिपति को जगाकर न्यायालय का घंटा बजाने वाले कांग्रेस ने जो किया वह अनुचित तो नहीं लेकिन तिलमिलाहट का नतीजा जरूर था। हालांकि न्यायाधिपतियों ने पूरी रात जाग कर लोकतांत्रिक अवसर उन्हें दिया और व्यवस्था के सभी प्रतिप्रश्नो का न्यायिक समाधान किया। लेकिन उन्होंने इसे लोकतंत्र से कहीं नहीं जोड़ा और न ही राज्यपाल के फैसले को गलत करार दिया। माननीय सुप्रीम कोर्ट का सुपर आदेश भी व्यवस्थाओं से जुड़ा था। उन्हीं ने माना कि आखिर जरूरी संख्या कहाँ से आएगी और यदि संख्या पूर्ण है तो 15 दिन का समय क्यों? इस पर ही यह व्यवस्था दी गयी कि येदियुरप्पा समय पर शपथ लेकर जल्दी बहुमत जाहिर करें। लिहाज़ा निर्णय हो गया और कम संख्याबल होने से पहले ही येदियुरप्पा सिंहासन खाली कर गए।
यह सब संवैधानिक व्यवस्था की खामी के तहत हुआ। अगर यह स्पष्ट होता कि हारे हुए कुछ दल होकर सरकार बना सकते हैं और उन्हें पहले बुलाया जा चाहिए तो राज्यपाल यही करते। फिर भी इतनी व्यवस्था तो है कि गैर बहुमत की सरकार नहीं बन सकती और उसे बहुमत जुटाने का मौका भी इस तरह नहीं दिया जा सकता जैसा कर्नाटक में हुआ । इसलिए प्रजातंत्र की जीत का नहीं व्यवस्था की जीत का जश्न मनाए, इस विशाल प्रजातांत्रिक देश की प्रजा शक्तिशाली है वह कभी नही हारती, हार होती है तो निहित खामियों की और राजनैतिक स्वार्थ के लिये बनाई अनैतिक नीतियों की।
सुरेंद्र बंसल
http://mediawala.in/column/Celebrating-the-victory-of-the-system
Friday, 4 May 2018
एकाधिनायक का काम पूरा हो चुका है सुरेंद्र बंसल
एकाधिनायक का काम पूरा हो चुका है
सुरेंद्र बंसल
शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्रित्व का सबसे लंबा कार्यकाल आनंद से पूरा किया है, इसलिए मज़ाक में कही बातों से आनंद ज्यादा आने लगता है। सच मान लो कि शिवराजसिंह के मप्र में पूर्ण होते 13 साल तक का मुख्यमंत्रिवत समयकाल अधिनायकवाद तो नहीं लेकिन इस दौर में वे प्रदेश के एकाधिनायक रहे हैं,जो दिग्विजय पर विजय से कहीं आगे बढ़ते हुए अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल पूरा कर रहे हैं।
बहरहाल बात उस आनंद की है जिसे शिवराजसिंह ने अकेले महसूस किया और बाकी ने इसे मप्र में राजनैतिक बवाल की तरह खड़ा किया।
शिवराजसिंह ने मप्र के मुख्यमंत्री के रूप में सबसे पहले 29 नवंबर 2005 में शपथ ली थी. फिर बीजेपी ने उनके कार्यकाल में ही वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में 230 सीटों में से 143 पर जीत के साथ बहुमत हासिल कर सबको चौंकाया था और तब शिवराज 2008 में दूसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. मध्यप्रदेश के चर्चित व्यापमं घोटाले के और डंपर घोटाले के आरोपों के बावजूद शिवराज 2013 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की 165 विधानसभा सीटों पर जीत के साथ 14 दिसंबर 2013 को तीसरी बार मुख्यमंत्री बने और आज वे मप्र में सबसे अधिक समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री हो गए हैं।
इस तरह वे अधिनायकवादी तो नहीं लेकिन प्रजातांत्रिक तरीके से चुने गए एकाधिनायक जरूर हो गए ।
रोमन गणतंत्र के संविधान में एकाधिनायकत्व या अधिनायकवाद से तात्पर्य संकटकालीन स्थिति में किसी एक व्यक्ति के अस्थायी रूप से असीमित अधिकार प्राप्त कर लेने से था। संकट टल जाने पर एकाधिनायक के असीमित अधिकार भी समाप्त हो जाते थे और उन्हें छोड़ते समय उसे उनके प्रयोगों का पूरा ब्योरा देना पड़ता था। लेकिन प्रजातांत्रिक भारतीय गणतंत्र में एकाधिनायक वही होता है जो राज के गुणी होते हैं या जिनके लिए कोई चुनौती नहीं होती। चौहान कोई संकटकालीन स्थिति से निर्मित भी नहीं थे , अलबत्ता बढ़ती बीजेपी के लिए मप्र में नेतृत्व एक संकट जरूर बन रहा था , सुंदरलाल पटवा बढती उम्र से, उमाभारती अति महत्वाकांक्षा से और बाबूलाल गौर अपने कमज़ोर प्रदर्शन से बीजेपी के लिए कमज़ोर नेतृत्व का कारक बन गए थे, ऐसे में 45 साल के युवा शिवराजसिंह मुख्यमंत्री बनाये गए तो बाद के सालों में बीजेपी को कोई दूसरा दमदार नेतृत्व भी नहीं मिला , लिहाज़ा शिवराजसिंह रिटायरमेंट की उम्र तक सीएम बने रहे हैं और शिवराजसिंह पार्टी सम्मत एकाधिनायक नेता हो गए। लेकिन इस तरह एकाधिनायकवाद सतत नहीं चल सकता , शिवराज सिंह के संदर्भ में यह मियाद पूरी हो चुकी है।ऐसे में भले आनंद से सीएम ने कहा हो माननीय मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली है इस पर चाहे जो बैठ सकता है , मैं जा रहा हूँ....यह सिर्फ मनोविनोद नहीं है ,यह संकेत हैं भीतर के जो यह दर्शाते हैं कि लंबी पारी सतत नहीं चलाई जा सकती इसलिए बदलाव अवश्यम्भावी हो गया है।
क्या कोई बड़ा राजनैतिक दल इतना कमजोर होता है कि अपनी दूसरी लाइन से नेतृत्व खड़ा नहीं कर सकता? आज बीजेपी के पास मप्र के संदर्भ में यही सबसे बड़ा और ज्वलंत प्रश्न है ,अब बीजेपी खुद शिवराजसिंह का विकल्प खोज लेना चाहती है । अमित शाह शायद तेज़ी से इसी लाइन पर काम कर रहे हैं और दूसरी पंक्ति के नेताओं में यही कूवत ढूंढने के प्रयास कर रहे हो तो आश्चर्य नहीं।
राकेश सिंह को दूर से ढूंढ लाना और प्रदेश अध्यक्ष बना देना इसी सोच का नतीजा है। शायद बीजेपी अब भी शिवराजसिंह की छवि से दूर नहीं है इसलिए उसकी प्रथमदृष्टया पसंद भी शिवराज जैसी छवि और गैर विवादित को सामने लाने की हो सकती है। कैलाश विजयवर्गीय और नरोत्तम मिश्रा को आगे लाने की खबर का मतलब यह कतई नहीं है कि बीजेपी के कर्ता इन्हें स्थापित करना चाह रहे हैं दरअसल बीजेपी के बड़े नेताओं को पता है कि आने वाले चुनाव में किस नेता से किस तरह का काम लेना है । अभी काम वाले काम पर लगाये जा रहे हैं फिर किसी काम का नेतृत्व ढूंढ लिया जाएगा , अगर अगले चुनाव में आपको कोई नया नेतृत्व मिले तो आश्चर्य नहीं। अपनी राजनैतिक दृष्टि तो यही कहती है शिवराज सिंह का राजकाल पूर्णाहुति पर है आने वाले समय में राज के लिए बीजेपी से जजमान कोई और ही होगा। क्योंकि रोमन गणतंत्रानुसार एकाधिनायक का काम पूरा हो चुका है और भारतीय गणतंत्र में अवसर किसी ओर को भी देना है।
सुरेंद्र बंसल
सुरेंद्र बंसल
बहरहाल बात उस आनंद की है जिसे शिवराजसिंह ने अकेले महसूस किया और बाकी ने इसे मप्र में राजनैतिक बवाल की तरह खड़ा किया।
इस तरह वे अधिनायकवादी तो नहीं लेकिन प्रजातांत्रिक तरीके से चुने गए एकाधिनायक जरूर हो गए ।
सुरेंद्र बंसल
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