Saturday, 24 December 2011

अन्ना का सपना सबका अपना


न्ना  हजारे का सपना जन लोकपाल बिल है. अन्ना के समर्थकों का भी यही सपना है जो लोग जन लोकपाल  पूरा या आधा अधूरा विरोध कर रहे हैं उन्हें  सपने में भी अन्ना का  सपना  नज़र  आता है जैसे अंग्रेजों को भारत छोडो आन्दोलन के दौरान महात्मा गाँधी सपने में जगा देते थे .अन्ना के इसी सपने को पूरा  करने  या न करने देने की कवायद बीतें कुछ महीनों से चल रही है . लेकिन सबकी नज़र में आज अन्ना का सपना है.
संसद में लोकपाल बिल रखते हुए सरकार ने अन्ना के सपने को तोड़ने की पुरजोर कोशिश की. लेकिन अन्ना जो उद्देश्य लेकर चल रहे हैं उसमे राष्ट्र की भावना निहित है . सरकार ने परवारे जो लोकपाल बिल में बदलाव या नयापन लाया है उसके पीछे सरकार का मकसद वादा तोड़ना भले न रहा हो अन्ना का सपना तोड़ना जरुर रहा है. कपिल सिब्बल जैसे वकील को इस महा अभियान में जुटाया गया और बिल लाकर वादा भी पूरा किया गया .पर क्या मजबूरियां सरकार की रही कि उन्हें जन लोकपाल में बदलाव करना पड़ा .?
लोकपाल कानून को प्रभावी ढंग से बनाने का मकसद क्या किसी का निजी हो सकता है ,लेकिन अन्ना टीम के साथ सरकार का वर्ताव कुछ ऐसा ही रहा जैसे अन्ना हजारे और लोग अपने लिए २ जी जैसे किसी लायसेंस के लिए कुछ फेरबदल करवाना चाह रहे हो. बात सांसदों और सरकार के अधिकारों की आती है और उसी के बूते यह हल्ला मचाया जा रहा  है संसद बड़ी है .पर कोई यह नहीं समझ रहा कि अन्ना का आन्दोलन संसद य सांसदों के अधिकारों को नहीं छीन रहा है , यह जताना  कि संसद में कानून बनाये तो कानून किस तरह राष्ट्र और जन हित में हो यह निज  नहीं है . अन्ना का हल्ला नहीं होता तो क्या संसद में आज लोकपाल बिल आता . भ्रष्ट लोगों पर सरकार जागी दीखती तो यह विरोध की आंधी कभी नहीं आती. संसद का सत्र आगे बढाया जाना भी अन्ना और जनता की जीत है इसे क्यों कर रही है सरकार , इसलिए कि  उसे अन्ना के आन्दोलन का भय सता रहा है, उससे ज्यादा जनता में बदते रोष का भय है और उससे भी ज्यादा भय इस बात का है कि भष्टाचार की कीचड़ से बाहर निकलना है तो कुछ तो कर दिखाना पड़ेगा नहीं तो इसी दलदल में डूब जाना पड़ेगा . जाहिर है भ्रष्टाचार का ज़हाज़ डूबने वाला है इसलिए इसमे सवार लोग अब बाहर निकलना कहते हैं .
सलिए अन्ना के सपने पर तो आज सब काम कर हैं , सरकार के भीतर और बाहर भी . यह ज़रूर अपने अपने स्वार्थ अनुसार इसमे लोग जुटे हैं , फिर भी अन्ना बधाई तुम्हे कि सरकार ने मजबूर होकर मजबूरी का लोकपाल बिल संसद में रख ही दिया , यह एक जीत है जैसे  भी सरकार ने बचने बचाने के खेल इसमे किये हैं फिर भी सबका मकसद अपने ढंग से भ्रष्टाचार पर लगाम कसना ही है, कमल यह आन्दोलन का है फद्फदे लालू यादव को भी दबते दबाते बिल का समर्थन काना पड़ा है. सोनिया गांधी भी जब आज बोली की अब लड़ाई आर या पार तो संसद के भीतर लोकपाल विधेयक रख कर ही बोली हैं . उनकी आर पार की लड़ाई सिर्फ वर्चस्व की कड़ाई है और अन्ना को हीरो नहीं बनाने देने की लड़ाई है फिर भी सपना तो वही है जो अन्ना का है या  अन्ना के सपने के विरोध का है .
संसद में जैसा भी और जो भी बिल पारित होगा वह  अन्ना के सपने से उत्पन्न ही होगा क्योंकि आज चर्चा बस यही है अन्ना का सपना सबक अपना !
सुरेन्द्र बंसल

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