Sunday, 4 March 2012

किस मोड़ पर जायेगी राष्ट्र की धारा !

किस मोड़ पर जायेगी राष्ट्र की धारा !

गंभीर आरोपों से केंद्र सरकार को झकझोरते हुए समयकाल के बीच पांच राज्यों में चल रहे चुनावी संग्राम का समापन हो गया , नतीजे मंगलवार को आने लगेगें . गोवा और मणिपुर ज्यादा चर्चित नहीं रहे , लेकिन पश्चिमोत्तर सीमा के पंजाब, उत्तराखंड,और उत्तरप्रदेश के चुनावी शोरगुल से पूरा देश दबा रहा , इस बीच हो हल्ले वाले विषय भी दब गए और बड़े बड़े घोटाले जाने कहाँ खो गए. वक़्त मीडिया के लिए और नेताओं के लिए भी चुनावी हो चला था और इस चुनाव में भ्रष्टाचार से बढकर जातिवाद , जोड़ तोड़ , बहुबल और धनबल ही था सो सबने इसी का इस्तेमाल किया और जोर लगाया .मीडिया भी इससे अछूता नहीं रहा 
भ्रष्टाचार और राजनीति के अपराधीकरण के विरोध में चले अभियान पर पनपे महा जन-रोष  के बाद हुए इस चुनाव में धारणा थी कि आक्रोश इतना फूट पडेगा कि राजनेताओं को भागना पड़ेगा और इन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़ना पड़ेगा . लेकिन ऐसा हुआ नहीं. खासकर उत्तरप्रदेश जैसे महा राज्य में जहाँ से राज्य के साथ साथ केंद्र की सरकार बनाने और बिगड़ने की संख्या ज्यादा है ,आखिर 85  सांसद उत्तरप्रदेश से चुने जाते हैं ऐसे में उत्तरप्रदेश का राजनैतिक महामहत्व है . और इसिलए मुद्दे वहां से उठे तो इसे राष्ट्रीय मुद्दे माना जाना चाहिए .

मुद्दे तो बनते है और लोग जब उससे जुड़ते जाते हैं तो ऐसे मुद्दे निर्णायक हो जाते है पहले भी बड़े आन्दोलन जब भी हुए उत्तरप्रदेश का उसमे योगदान रहा और उत्तरप्रदेश ने केंद्र और राज्य दोनों तरफ ज्वलंत मुद्दों पर अपनी बे -बाक राय जाहिर करते हुए सत्ता परिवर्तन भी किया . इस बार ऐसा नहीं लगा कि अन्ना हजारे के विशाल जनांदोलन और आन्दोलन को मिले समर्थन के बाद यहाँ भ्रष्टाचार कोई बड़ा मुद्दा बन गया हो.इसकी कहीं कोई ललक और लहर नहीं दिखी हालाँकि ६ मार्च दिखाएगा कि यह दिन चौकानेवाला है या नहीं , फिल वक़्त  ऐसी कोई खबर नहीं है . इसलिए यह चौकानेवाली बात है कि इस महा चुनाव में मुद्दे जो राष्ट्रीय धारा से उपज रहे थे वे आखिर  कहाँ खो गए लगते हैं .लोकतान्त्रिक राज़ में मुद्दों का खो जाना या उनका असरकारक नहीं बनना चिंता की बात है .

चिंता यह नहीं कि मुद्दे ये क्यों नहीं बने , चिंता का लोकतंत्र पर खतरा यह है कि मुद्दे वे बने जो लोक को एक कर तंत्र बनाने की इच्छा नहीं रखते वे लोक को बांटकर तंत्र का ख्वाब तैयार करते हैं . उत्तरप्रदेश में यही हुआ , जो बंटाओ हुआ वह जातिगत हुआ और वोट कबाडने की नीति भी सामाजिक बंटाओ के मुद्दे पर आधारित रही यही वजह रही कि राष्ट्रीय दल जिनमे कांग्रेस और भाजपा जैसी बड़ी परतिया भी हैं उन्होंने इन्हीं मुद्दों पर अपने को क्षेत्रीय दलों में बंधित कर लिया और उन्ही आधार पर वहां चुनाव लड़ा ,यह सर्वाधिक चिंतनीय होना चाहिए , उत्तरप्रदेश में हर कोई लोगो को उसके जाति और जमात  के आधार पर बांटने में लगा रहा . ये चुनाव आखिर राष्ट्र की धारा को किस मोड़ पर ले जायेंगें .

सुरेन्द्र बंसल 

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