एकाधिनायक का काम पूरा हो चुका है
सुरेंद्र बंसल
शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्रित्व का सबसे लंबा कार्यकाल आनंद से पूरा किया है, इसलिए मज़ाक में कही बातों से आनंद ज्यादा आने लगता है। सच मान लो कि शिवराजसिंह के मप्र में पूर्ण होते 13 साल तक का मुख्यमंत्रिवत समयकाल अधिनायकवाद तो नहीं लेकिन इस दौर में वे प्रदेश के एकाधिनायक रहे हैं,जो दिग्विजय पर विजय से कहीं आगे बढ़ते हुए अब तक का सबसे लंबा कार्यकाल पूरा कर रहे हैं।
बहरहाल बात उस आनंद की है जिसे शिवराजसिंह ने अकेले महसूस किया और बाकी ने इसे मप्र में राजनैतिक बवाल की तरह खड़ा किया।
शिवराजसिंह ने मप्र के मुख्यमंत्री के रूप में सबसे पहले 29 नवंबर 2005 में शपथ ली थी. फिर बीजेपी ने उनके कार्यकाल में ही वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में 230 सीटों में से 143 पर जीत के साथ बहुमत हासिल कर सबको चौंकाया था और तब शिवराज 2008 में दूसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे. मध्यप्रदेश के चर्चित व्यापमं घोटाले के और डंपर घोटाले के आरोपों के बावजूद शिवराज 2013 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की 165 विधानसभा सीटों पर जीत के साथ 14 दिसंबर 2013 को तीसरी बार मुख्यमंत्री बने और आज वे मप्र में सबसे अधिक समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री हो गए हैं।
इस तरह वे अधिनायकवादी तो नहीं लेकिन प्रजातांत्रिक तरीके से चुने गए एकाधिनायक जरूर हो गए ।
रोमन गणतंत्र के संविधान में एकाधिनायकत्व या अधिनायकवाद से तात्पर्य संकटकालीन स्थिति में किसी एक व्यक्ति के अस्थायी रूप से असीमित अधिकार प्राप्त कर लेने से था। संकट टल जाने पर एकाधिनायक के असीमित अधिकार भी समाप्त हो जाते थे और उन्हें छोड़ते समय उसे उनके प्रयोगों का पूरा ब्योरा देना पड़ता था। लेकिन प्रजातांत्रिक भारतीय गणतंत्र में एकाधिनायक वही होता है जो राज के गुणी होते हैं या जिनके लिए कोई चुनौती नहीं होती। चौहान कोई संकटकालीन स्थिति से निर्मित भी नहीं थे , अलबत्ता बढ़ती बीजेपी के लिए मप्र में नेतृत्व एक संकट जरूर बन रहा था , सुंदरलाल पटवा बढती उम्र से, उमाभारती अति महत्वाकांक्षा से और बाबूलाल गौर अपने कमज़ोर प्रदर्शन से बीजेपी के लिए कमज़ोर नेतृत्व का कारक बन गए थे, ऐसे में 45 साल के युवा शिवराजसिंह मुख्यमंत्री बनाये गए तो बाद के सालों में बीजेपी को कोई दूसरा दमदार नेतृत्व भी नहीं मिला , लिहाज़ा शिवराजसिंह रिटायरमेंट की उम्र तक सीएम बने रहे हैं और शिवराजसिंह पार्टी सम्मत एकाधिनायक नेता हो गए। लेकिन इस तरह एकाधिनायकवाद सतत नहीं चल सकता , शिवराज सिंह के संदर्भ में यह मियाद पूरी हो चुकी है।ऐसे में भले आनंद से सीएम ने कहा हो माननीय मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली है इस पर चाहे जो बैठ सकता है , मैं जा रहा हूँ....यह सिर्फ मनोविनोद नहीं है ,यह संकेत हैं भीतर के जो यह दर्शाते हैं कि लंबी पारी सतत नहीं चलाई जा सकती इसलिए बदलाव अवश्यम्भावी हो गया है।
क्या कोई बड़ा राजनैतिक दल इतना कमजोर होता है कि अपनी दूसरी लाइन से नेतृत्व खड़ा नहीं कर सकता? आज बीजेपी के पास मप्र के संदर्भ में यही सबसे बड़ा और ज्वलंत प्रश्न है ,अब बीजेपी खुद शिवराजसिंह का विकल्प खोज लेना चाहती है । अमित शाह शायद तेज़ी से इसी लाइन पर काम कर रहे हैं और दूसरी पंक्ति के नेताओं में यही कूवत ढूंढने के प्रयास कर रहे हो तो आश्चर्य नहीं।
राकेश सिंह को दूर से ढूंढ लाना और प्रदेश अध्यक्ष बना देना इसी सोच का नतीजा है। शायद बीजेपी अब भी शिवराजसिंह की छवि से दूर नहीं है इसलिए उसकी प्रथमदृष्टया पसंद भी शिवराज जैसी छवि और गैर विवादित को सामने लाने की हो सकती है। कैलाश विजयवर्गीय और नरोत्तम मिश्रा को आगे लाने की खबर का मतलब यह कतई नहीं है कि बीजेपी के कर्ता इन्हें स्थापित करना चाह रहे हैं दरअसल बीजेपी के बड़े नेताओं को पता है कि आने वाले चुनाव में किस नेता से किस तरह का काम लेना है । अभी काम वाले काम पर लगाये जा रहे हैं फिर किसी काम का नेतृत्व ढूंढ लिया जाएगा , अगर अगले चुनाव में आपको कोई नया नेतृत्व मिले तो आश्चर्य नहीं। अपनी राजनैतिक दृष्टि तो यही कहती है शिवराज सिंह का राजकाल पूर्णाहुति पर है आने वाले समय में राज के लिए बीजेपी से जजमान कोई और ही होगा। क्योंकि रोमन गणतंत्रानुसार एकाधिनायक का काम पूरा हो चुका है और भारतीय गणतंत्र में अवसर किसी ओर को भी देना है।
सुरेंद्र बंसल
सुरेंद्र बंसल
बहरहाल बात उस आनंद की है जिसे शिवराजसिंह ने अकेले महसूस किया और बाकी ने इसे मप्र में राजनैतिक बवाल की तरह खड़ा किया।
इस तरह वे अधिनायकवादी तो नहीं लेकिन प्रजातांत्रिक तरीके से चुने गए एकाधिनायक जरूर हो गए ।
सुरेंद्र बंसल
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