Sunday, 20 May 2018

जश्न मनाइए व्यवस्था की जीत का

जश्न मनाइए व्यवस्था की जीत का*


सुरेंद्र बंसल

कर्नाटक में बीजेपी अंदर आकर बाहर हो गयी।इसे कांग्रेस, जेडीएस की जीत और प्रजातंत्र की जीत माना जा रहा है। मैंने लिखा था थिरकते पांव में कांटे की चुभन, इस चुभन की टीस से बीजेपी बाहर नहीं हो पायी और उसके दर्द को देख कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर उसे धक्का मार दिया। लेकिन आज जब सदन में येदियुरप्पा विश्वास मत के पहले ही बाहर चले गए तो कांग्रेस और जेडीएस इसे प्रजातंत्र  और उनकी जीत मान रही है यह शायद लड़खड़ाकर गिरने वाले को देख खुशी का अतिरेक व्यक्त करना है।

मैं इस आलेख से प्रजातंत्र की हारजीत को कुछ स्पष्ट कर देना चाहता हूं। जब चुनाव के परिणाम आये तब 222 विधानसभा सीटों पर बीजेपी को 104 , कांग्रेस को 78, और जेडीएस को 37 सीटों पर जीत मिली। यह खण्डित जनादेश किसी भी दल के पक्ष में नही था अलबत्ता बीजेपी जनादेश के सबसे नजदीक थी। कांग्रेस और जेडीएस साफ साफ नकार दी गयी उसे लोकतंत्र ने स्पष्ट नामंजूर किया।

सरकार किसकी और कैसे बने  यह लोकतंत्र का नहीं व्यवस्था का प्रश्न बना । चूंकि राज्यपाल इस व्यवस्था के प्रथम अधिकार सम्मत अंग होते हैं अतः उन्हें ही अपने विवेक से संविधान की मर्यादा के अनुरूप  निर्णय करना होता है। ऐसी परिस्थिति में संविधान यह स्पष्ट कहीं नहीं करता कि चुनाव बाद दो भिन्न भिन्न राजनैतिक दल एक हो जाये तो पहला अवसर इस नवगठजोड को देना जरूरी होगा। ऐसे में राज्यपाल वजुभाई ने कहीं गलत नहीं किया हालांकि वे इस नए गठजोड़ को भी पहले आमंत्रित कर लेते तब भी गलत नहीं होता। लेकिन राज्यपाल वजुभाई ने सबसे बड़े राजनैतिक दल को मौका दिया, इसे अनैतिक कहना अब भी अनुचित है। मेरी दृष्टि में अनैतिक तो दो हारे हुए दलों का गठजोड़ है जो नीतिगत तौर पर चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ रहे हैं और चुनाव बाद सत्ता की ललक लेकर एक हो गए है। ऐसे गठजोड़ कहीं भी हुए हैं वे सब भी एक तरह से अनैतिक और अराजक राजनीति है।

अब कनार्टक में प्रजातंत्र ने क्या कहा? प्रजातंत्र ने साफ साफ कहा उसे कांग्रेस और जेडीएस तो बिल्कुल भी नहीं चाहिये, बीजेपी को एक हद तक प्रजातंत्र ने मंजूर किया लेकिन पूरे विश्वास के साथ नहीं लिहाज़ा बीजेपी को विश्वास का मत नहीं मिला। अब जब बीजेपी सदन में बहुमत संख्या नहीं ला सकी तो प्रजातंत्र की जीत कैसे हुई। और आने वाले दिनों में मतदाताओं के सामने दुश्मनों की तरह लड़े दल एक होकर सरकार बना लेंगे तब प्रजातंत्र की जीत कैसे होगी? क्या यह प्रजातंत्र और मतदाताओं के साथ धोखा नहीं होगा? सवाल जब खड़े होते हैं तो उनके जवाब सौ फीसदी खरे और सच्चे होना चाहिए। प्रजातंत्र को यहां अपने फायदे के लिए परिभाषित करना अनुचित होगा, इसलिए कांग्रेस और जेडीएस दोनों का यह कहना है कि प्रजातंत्र की जीत हुई है तो उन्हें सरकार बनाने के दावे से सबसे पहले स्वयं को खारिज़ करना होगा क्योंकि दोनों राजनैतिक दल प्रजातंत्र से नकारे  हुए ऐसे दल हैं जो दलदल से सत्ता का सिंहासन गढ़ने में लगे हैं।इसलिए भी कि कुमारस्वामी जिन्हें दोनों दल आदरभाव और सम्मान से अपना नेता और मुख्यमंत्री मान रहे हैं उन्हीं कुमारस्वामी ने कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर  70 लाख की चोरी की घड़ी पहनने का आरोप लगाकर सीबीआई से जांच की मांग की थी  इसे अब क्या कहा जाए नैतिक या अनैतिकता?

 बहरहाल उपसंहार से पहले बात सर्वोच्च न्यायालय की। देर रात देश के सबसे बड़े माननीय न्यायाधिपति को जगाकर न्यायालय का घंटा बजाने वाले कांग्रेस ने जो किया वह अनुचित तो नहीं लेकिन तिलमिलाहट का नतीजा जरूर था। हालांकि न्यायाधिपतियों ने पूरी रात जाग कर लोकतांत्रिक अवसर उन्हें दिया और व्यवस्था के सभी प्रतिप्रश्नो का न्यायिक समाधान किया। लेकिन उन्होंने इसे लोकतंत्र से कहीं नहीं जोड़ा और न ही राज्यपाल के फैसले को गलत करार दिया। माननीय सुप्रीम कोर्ट का सुपर आदेश भी व्यवस्थाओं से जुड़ा था। उन्हीं ने माना कि आखिर जरूरी संख्या कहाँ से आएगी और यदि संख्या पूर्ण है तो 15 दिन का समय क्यों? इस पर ही यह व्यवस्था दी गयी कि येदियुरप्पा समय पर शपथ लेकर जल्दी बहुमत जाहिर करें। लिहाज़ा निर्णय हो गया और कम संख्याबल होने से पहले ही येदियुरप्पा सिंहासन खाली कर गए।

यह सब संवैधानिक व्यवस्था की खामी के तहत हुआ। अगर यह स्पष्ट होता कि हारे हुए कुछ दल होकर सरकार बना सकते हैं और उन्हें पहले बुलाया जा चाहिए तो राज्यपाल यही करते। फिर भी इतनी व्यवस्था तो है कि गैर बहुमत की सरकार नहीं बन सकती और उसे बहुमत जुटाने का मौका भी इस तरह नहीं दिया जा सकता जैसा कर्नाटक में हुआ । इसलिए प्रजातंत्र की जीत का नहीं व्यवस्था की जीत का जश्न मनाए, इस विशाल प्रजातांत्रिक देश की प्रजा शक्तिशाली है वह कभी नही हारती, हार होती है तो निहित खामियों की और राजनैतिक स्वार्थ के लिये बनाई अनैतिक नीतियों की।

सुरेंद्र बंसल

http://mediawala.in/column/Celebrating-the-victory-of-the-system

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